मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं कि वह संसार में अकेला है, बल्कि यह है कि वह स्वयं से अपरिचित है। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर उतरना सीख लेता है, उसी दिन उसे ज्ञात हो जाता है कि जिसे वह अब तक अकेलापन समझता रहा, वह वस्तुतः आत्मा के द्वार तक पहुँचने का एक स्वर्णिम अवसर था। संसार की भीड़ में रहकर भी जो स्वयं से दूर है, वह अकेला है; और निर्जन वन में रहकर भी जो अपनी आत्मा के सान्निध्य में स्थित है, वह एकांतवासी है। एकांत और अकेलापन दोनों शब्द सुनने में समान प्रतीत होते हैं, किन्तु इनके भाव बिल्कुल विपरीत हैं। अकेलापन अभाव की अनुभूति है, जबकि एकांत आत्म-समृद्धि का उत्सव है। अकेलापन बाहर की दुनिया को खोजता है, एकांत भीतर के प्रकाश को। अकेलापन परावलम्बन