क्षमा मनुष्य की कमजोरी नहीं, उसकी आंतरिक शक्ति है। यह केवल किसी की भूल को माफ कर देने का भाव नहीं, बल्कि अपने भीतर से क्रोध, अहंकार, वैर और प्रतिशोध को विसर्जित करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। जैन दर्शन ने इसी कारण क्षमा को धर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया है। क्षमाधर्म व्यक्ति के अंतर्मन को निर्मल करता है, उसके संबंधों में मधुरता लाता है और व्यापक रूप से समाज तथा विश्व में शांति की आधारभूमि तैयार करता है। आज की दुनिया वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास और संचार की अभूतपूर्व गति के बावजूद तनाव और संघर्ष से मुक्त नहीं हो सकी है। परिवारों में मनमुटाव है, समाज में वैचारिक टकराव है और विश्व के अनेक हिस्सों में संघर्ष की स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे समय में क्षमाधर्म केवल आध्यात्मिक चिंतन का विषय नहीं,