विचारों की लड़ाई

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हम मनुष्य जाति के लोग एक जीवित प्राणी हैं। वैसे तो जीवन पशु-पक्षी, किट-पतंगे इत्यादि में भी है, परन्तु फिर भी हम उनसे अलग है। ऐसा क्यों? क्योंकि हमारे सोचने-समझने, निर्णय लेने या किसी अन्य बौद्धिक कार्य में पशु-पक्षियों की तुलना में ज़मीन-आसमान का फर्क है। हमारी यही ताकत कहीं ना कहीं हमारी कमजोरी भी बन गई है।

सन 2020 के क्वींस यूनिवर्सिटी के एक शोध के अनुसार एक औसत मानव के मन में प्रति दिन लगभाग 6,200 विचार उत्पन्न होते हैं। इनमे से अधिकतर अपने को दोहराते है अर्थात एक ही विचार बार-बार आते है। इनमें से कुछ विचार हम चेतन अवस्था में तो कुछ अचेतन अवस्था में सोचते हैं। मन एक और विचार अनेक, इन सभी विचारों का साक्षी आत्मा बनता है।

समस्या विचारो की संख्या से नहीं वरन इनके अनियंत्रित प्रवाह से है। आपत्ति तब है जब यही विचार आत्मघाती बनने लगती है। सरल भाषा में कहे तो आपका ही मन आपके विरुद्ध विचारों का षड्यंत्र रचने लगता है जो आपकी विफलता का कारण बनती है। बार-बार ऐसे विचारों का आना जो अपको एक कमजोर, लाचार, शक्तिहीन व्यक्ति बनने पर मजबूर कर देती है। कभी आपने सोचा है कि भला एक सफल व्यक्तित्व और एक हारे हुए व्यक्तित्व में क्या अंतर होता है? आख़िर क्यों कुछ लोग जीवन को वैसे जी पाते हैं जैसा वो चाहते हैं और कुछ ऐसे है जो अँधेरे कमरे में ही बंद होकर रह जाते है? दोनो में फर्क है तो केवल विचारो का! जहाँ एक का विचार विकासकारी होता है तो दूसरे का विध्वंसकारी। शास्त्रों का कथन है:

“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।”

अर्थात मन ही आपका मित्र है और मन ही आपका शत्रु भी। यही आपका बंधन या मोक्ष का कारण भी है। यदि हम मन को नियंत्रित करना सीख ले तो विचार स्वतः ही सही प्रवाह में बहने लगेंगे। क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि जब आप सुबह-सँवेरे शीशे के सामने दंत-मंजन कर रहे हों और अचानक से आपके मन में बीते हुए कल की कोई बात आई और आपके विचार आपको उलझा कर आपको ये मानने पर मजबूर कर दिए कि आप कोई काम के नहीं, और एक असफल व्यक्ति हो? अधिकतर लोगों के साथ ऐसा होता है, मंजन करते वक्त नहीं तो शायद बिस्तर पर लेटे-लेटे।

बार-बार विचारों का यह प्रहार स्वयं को एक हारा हुआ इंसान बना देता है। स्वयं के विचार स्वयं के ही तनाव का कारण बन जाते हैं। व्यक्ति का पूरा दिन अपने विचारों से लड़ने में ही निकल जाता है। अफ़शोश !

मैं इस लेख में समस्या के हल या सुझाव पर कोई चर्चा नहीं करूँगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मेरे इस लेख का उद्देश्य केवल आपका ध्यान इस ओर आकर्षित करना है की ऐसा क्या है जो आपको परेशान कर रहा है और एक सुखी जीवन जीने में बाधा है। कई बार हम समस्या को गधे की तरह धो रहे होते हैं लेकिन कभी ये नहीं सोचते कि हम इस उलझन को आखिर धो ही क्यों रहे हैं! एकांत स्थान पर बैठिये और स्वयं विचार कीजिए, सवाल कीजिए स्वयं से कि कब तक आप इस आत्मघाती उलझन में जीते रहेंगे? ज़हर को ज़हर ही काटता है और आपके अनियंत्रित विचारो की समस्या स्वयं विचार करने से ही सुलझेंगे।

लेखक – यश जयसवाल, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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