चंदेरी मेरी मातृभूमि है। वहीं अपनी पैतृक भूमि पर मैंने अपने प्रयासों से एक जिनालय का निर्माण कराया, जो आज “सर्वोदय तीर्थ आदिश्वरम” के नाम से विख्यात है। यह जिनालय “तीर्थंकर ऋषभदेव सर्वोदय फाउंडेशन” ट्रस्ट के अंतर्गत निर्मित है, जो विधिवत मध्यप्रदेश शासन द्वारा पंजीकृत संस्था है। इस जिनालय का भव्य पंचकल्याणक वर्ष 2013 में आचार्य श्री विमर्श सागर जी ससंघ एवं पूज्य कानजी स्वामी के अनन्य भक्त डॉ. हुकमचंद भारिल्ल के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ था।
मेरी आस्था दिगंबर मुनिराजों के प्रति जितनी गहरी है, उतनी ही श्रद्धा पूज्य श्री कानजी स्वामी के प्रति भी है। विगत लगभग 50 वर्षों से मैं टोडरमल स्मारक जैसी विराट संस्था से जुड़ा हूं, जिसका संचालन कानजी स्वामी के अनुयायियों द्वारा किया जाता है।पूज्य आचार्य श्री विद्यानंद जी के निकट रहकर उनके बताए इस मंत्र को आत्मसात किया है-
‘मत ठुकराओ, गले लगाओ, धर्म सिखाओ’। उन्होंने ही सिखाया कि *केंची नहीं सुई धागे का काम करो*। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मैं पिछले पांच दशकों से सक्रिय हूं तथा “समन्वय वाणी” का संपादन करते हुए समाज में व्याप्त विकृतियों के विरुद्ध सदैव मुखर रहा हूं।
19 मई की एक घटना ने मुझे अत्यंत व्यथित किया है। चंदेरी के एक समाजश्रेष्ठि, जो आदिश्वरम जिनालय से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और संरक्षक का दायित्व निभा रहे हैं, उनका फोन आया। उन्होंने बताया कि यहां कुछ मुनिराज विराजमान हैं और उनकी इच्छा है कि आदिश्वरम जिनालय में आचार्य श्री (एक विशेष संघ) के चरण स्थापित किए जाएं।
मैंने स्पष्ट और विनम्र शब्दों में कहा कि यह निर्णय किसी एक व्यक्ति का नहीं हो सकता। चूंकि जिनालय एक ट्रस्ट के अंतर्गत संचालित है, इसलिए सभी ट्रस्टियों की सहमति आवश्यक होगी। बिना ट्रस्टियों की अनुमति के मैं अकेले कोई स्वीकृति नहीं दे सकता। इसके बाद जिनसे मेरी बात कराई गई, संभवतः वे कोई मुनिराज थे। उन्हें भी मैंने यही निवेदन किया कि प्रस्ताव ट्रस्टियों के समक्ष रखा जाएगा और सामूहिक सहमति बनने पर ही आगे निर्णय संभव होगा।
इसके तुरंत बाद ललितपुर से जयकुमार जी हिरावल वालों का फोन आया। उन्होंने भी वही आग्रह दोहराया। जब मैंने उन्हें भी यही उत्तर दिया कि अंतिम निर्णय ट्रस्टियों की सहमति से ही होगा, तो वे अत्यंत आक्रोशित हो गए। उन्होंने मुझे दो दिन का अल्टीमेटम देते हुए कठोर शब्दों में कहा — “दो दिन बाद यदि स्वीकृति नहीं दी तो हम तुम्हें देख लेंगे।”
एक पत्रकार होने के नाते मैं कभी धमकियों से भयभीत नहीं हुआ। किंतु प्रश्न केवल मेरी व्यक्तिगत सुरक्षा या सम्मान का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा के नाम पर किसी ट्रस्ट, संस्था या व्यक्ति पर दबाव बनाना उचित है? क्या यह जैन धर्म की सहिष्णुता, अहिंसा और अनेकांत की मूल भावना के अनुरूप है?
यदि मुझे या मेरे परिवार को जयकुमार हिरावल अथवा उनके सहयोगियों द्वारा किसी प्रकार की हानि पहुंचाने का प्रयास किया जाता है, तो उसकी समस्त जिम्मेदारी संबंधित व्यक्तियों की होगी। प्रशासन को भी इस प्रकार की दबावपूर्ण एवं तनाव उत्पन्न करने वाली गतिविधियों पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
वर्तमान परंपरा में जहां किसी मुनिराज की समाधि होती है, वहीं उनके चरण स्थापित करने की परंपरा रही है। अन्य स्थानों पर सामान्यतः उन्हीं महापुरुषों के चरण स्थापित किए जाते हैं जिन्हें पूर्वकाल में मोक्षगामी माना गया है। वर्तमान काल में किसी के मोक्षगमन का आगमिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्रत्येक मंदिर में किसी विशेष आचार्य संघ के चरण स्थापित करने का आग्रह या दबाव कहां तक उचित माना जाए — यह गंभीर चिंतन का विषय है।
यह भी उल्लेखनीय है कि चंदेरी में इसी संघ के मुनिराजों द्वारा पूर्व में प्रसिद्ध चौबीसी मंदिर से कानजी स्वामी अथवा उनकी विचारधारा से संबंधित संस्थाओं द्वारा प्रकाशित जिनवाणी साहित्य को बलपूर्वक हटवाया जा चुका है। ऐसे वातावरण में कानजी स्वामी के अनुयायियों द्वारा निर्मित मंदिर में दबाव बनाकर किसी विशेष संघ के चरण स्थापित कराने का प्रयास स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न खड़े करता है।
धर्म का कार्य जोड़ना है, तोड़ना नहीं। यदि समाज में विचारों का मतभेद है तो उसका समाधान संवाद और सहमति से होना चाहिए, न कि दबाव, धमकी और कटुता से। इस प्रकार की घटनाएं समाज में बैमनस्यता और विभाजन को जन्म देंगी, जो किसी भी दृष्टि से हितकारी नहीं है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन समाज के सभी संत, मुनि, विद्वान और समाजश्रेष्ठि आत्ममंथन करें। अनेकांत और सहिष्णुता की परंपरा को जीवित रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम वैचारिक असहमति को भी सम्मानपूर्वक स्वीकार करना नहीं सीख पाए, तो समाज का ताना-बाना कमजोर होता जाएगा।
जनगणना का समय निकट है। ऐसे समय समाज को विभाजन नहीं, बल्कि संगठन, संवाद और पारस्परिक सम्मान की सबसे अधिक आवश्यकता है।
– डा. अखिल बंसल








