कैंसर दवाओं पर शुल्क में कमी से उपचार होगा सस्ता, मरीजों को सीधा राहत मिलने की उम्मीद

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नई दिल्ली। कैंसर उपचार पर होने वाला भारी खर्च अब कुछ कम हो सकता है। सरकार द्वारा कैंसर दवाओं पर शुल्क घटाने के निर्णय से मरीजों पर आर्थिक बोझ कम होने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव विशेष रूप से गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कैंसर देश में सबसे महँगी बीमारियों में से एक माना जाता है।

भारत में किसी सामान्य बीमारी के मुकाबले कैंसर का उपचार व्यय लगभग तीन गुना तक अधिक होता है। दवाओं की कीमत तो कई बार कुल उपचार खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा बन जाती है, विशेषकर उन सार्वजनिक अस्पतालों में जहाँ मरीज आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से आते हैं।

भारत में कैंसर की दवाओं पर निर्भरता अधिक होने के कारण उपचार की लागत लगातार बढ़ती जा रही है।

सरकारी निर्णय के असर की चर्चा तेज़

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार शुल्क में कटौती से अनेक आवश्यक कैंसर दवाएँ पहले की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध होंगी।

अधिकारियों का अनुमान है कि कुछ दवाओं के मूल्य में 10 से 20 प्रतिशत तक कमी देखने को मिल सकती है, जिसका प्रभाव सरकारी और निजी दोनों स्वास्थ्य संस्थानों पर पड़ेगा।

सरकारी अस्पताल—जहाँ पहले से ही बड़ी संख्या में कैंसर मरीज इलाज कराते हैं—इस परिवर्तन से सबसे अधिक लाभान्वित होंगे। कम कीमत पर दवाओं की उपलब्धता से इन अस्पतालों का दवा बजट घटेगा और अधिक मरीजों को उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा।

ग्रामीण और गरीब मरीजों के लिए राहत

स्वास्थ्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर का निदान देर से होता है, जिससे उपचार लंबा और महँगा पड़ता है।

इन इलाकों में सरकारी अस्पताल ही मुख्य सहारा होते हैं, जहाँ उपचार की लागत में दवाएँ ही सबसे भारी हिस्सा बनती हैं। डॉक्टरों के अनुसार दवाओं की कीमत में कमी से—

• उपचार बीच में रोक देने की घटनाएँ घटेंगी,

• गरीब परिवारों पर कर्ज का बोझ कम होगा,

• ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी।

क्यों महँगा है कैंसर उपचार?

ऑंकोलॉजी विशेषज्ञ बताते हैं कि कैंसर उपचार में कई प्रकार की प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं, जिनमें—

• लगातार स्कैन और परीक्षण,

• लक्षित उपचार (टार्गेटेड थेरेपी),

• प्रतिरक्षा आधारित दवाएँ,

• कीमोथेरेपी और रेडिएशन,

• दीर्घकालिक दवाएँ,

• भर्ती और विशेषज्ञों की फीस

इन सबका खर्च जोड़ने पर मरीजों को भारी आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है। कई परिवार उपचार अवधि में अपनी आय का अधिकांश हिस्सा दवाओं पर खर्च कर देते हैं।

निजी और सरकारी अस्पतालों में लागत का अंतर

स्वास्थ्य विश्लेषण से पता चलता है कि निजी अस्पतालों में इलाज की कुल लागत अधिक होती है, लेकिन सबसे अधिक सापेक्ष दबाव सरकारी अस्पतालों के मरीजों पर पड़ता है।

इसके कारण—

• सरकारी अस्पतालों में गरीब वर्ग की संख्या अधिक

• दवाओं की ऊँची कीमतों का सीधा असर

• निजी संस्थानों की तुलना में संसाधनों की कमी

इसी वजह से शुल्क में कमी सरकारी सुविधाओं में इलाज करा रहे मरीजों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत में कैंसर के बढ़ते मामले

राष्ट्रीय स्वास्थ्य आँकड़ों के अनुसार देश में कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। प्रमुख प्रकारों में स्तन कैंसर, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, मुख–कैंसर और आँतों के कैंसर के मामलों में तेजी आई है।

चिकित्सकों का कहना है कि—

• अस्वास्थ्यकर जीवनशैली,

• तंबाकू सेवन,

• प्रदूषण

• तथा नियमित जांच का अभाव इन बीमारियों को बढ़ावा दे रहा है, जिससे उपचार की मांग भी बढ़ रही है।

दवाओं के सस्ते होने से क्या बदल सकता है?

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि शुल्क में कटौती का असर अगले कुछ महीनों में स्पष्ट रूप से दिखेगा।

मरीजों को—

• सस्ती दवाओं की उपलब्धता,

• निरंतर उपचार बनाए रखने में सुविधा,

• और आर्थिक पक्ष में राहत मिल सकती है।

सरकारी एजेंसियों का कहना है कि दवाओं के मूल्य में कमी का लाभ उपचार से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी महसूस होगा, जिससे अधिक मरीज समय पर इलाज करा पाएँगे।

समाचार लेखक: युवराज कुमार (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)

YUVRAJ KUMAR
Author: YUVRAJ KUMAR

प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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