मेनका गांधी को आधारभूत जैन सिद्धांत समझने की आवश्यकता

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भारतीय संस्कृति का वास्तविक सौंदर्य उसकी विविधता में नहीं, बल्कि विविध परंपराओं के प्रति उसके सम्मान में निहित है। किसी भी धर्म, संप्रदाय अथवा साधना-पद्धति पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पूर्व उसके मूल सिद्धांतों, परंपराओं और शास्त्रीय आधार का सम्यक् अध्ययन अपेक्षित है। जब कोई प्रतिष्ठित सार्वजनिक व्यक्तित्व बिना पर्याप्त जानकारी के किसी धर्म की प्राचीन परंपरा पर प्रश्नचिह्न लगाता है, तब वह केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि करोड़ों अनुयायियों की आस्था पर भी अनावश्यक आघात करता है।

हाल ही में दिगंबर जैन मुनि पूज्य मुनि श्री सौरभ सागर जी महाराज के समक्ष मेनका गांधी द्वारा पीच्छी के संबंध में व्यक्त की गई आपत्ति अनेक जिज्ञासाओं को जन्म देती है। यदि वास्तव में यह कहा गया कि पीच्छी लाखों मोरों की हत्या का कारण है, तो यह कथन जैन परंपरा की मूल भावना और उसके व्यवहारिक स्वरूप—दोनों से ही मेल नहीं खाता। ऐसा कथन वस्तुतः अधूरी जानकारी का परिणाम प्रतीत होता है।

जैन दर्शन संसार का सर्वाधिक सूक्ष्म अहिंसा-दर्शन माना जाता है। यहाँ केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय तक प्रत्येक जीव के प्रति दया, करुणा और संरक्षण का भाव रखा जाता है। दिगंबर जैन मुनि चलते समय भी अत्यंत सावधानी रखते हैं ताकि किसी सूक्ष्म जीव की भी हिंसा न हो। वे अनावश्यक रूप से पत्तियाँ नहीं तोड़ते, हरियाली को क्षति नहीं पहुँचाते, जल का दुरुपयोग नहीं करते, रात्रि में अनावश्यक भ्रमण से बचते हैं और जीवन के प्रत्येक क्षण में अहिंसा का सर्वोच्च अनुशासन निभाते हैं। उनके लिए हिंसा केवल शारीरिक कृत्य नहीं, बल्कि मन, वचन और काया से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक अशुभ भाव भी है।

ऐसी तपश्चर्या में जीवन व्यतीत करने वाले मुनि पर यह आरोप कि वे अपने उपकरण के लिए मोरों की हत्या करवाते होंगे, न केवल तथ्यहीन प्रतीत होता है बल्कि जैन दर्शन की आत्मा के भी प्रतिकूल है। दिगंबर परंपरा में प्रयुक्त पीच्छी किसी जीवित मोर के पंख नोचकर नहीं बनाई जाती। परंपरा के अनुसार मोर अपने प्राकृतिक जीवन-चक्र में समय आने पर जो पंख स्वयं छोड़ देता है, उन्हीं गिरे हुए पंखों को संग्रहित कर पीच्छी तैयार की जाती है। इसका उद्देश्य किसी जीव को कष्ट पहुँचाना नहीं, बल्कि साधु के द्वारा सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना है। बैठने के स्थान को अत्यंत कोमलता से स्वच्छ करना, सूक्ष्म जीवों को बिना हानि पहुँचाए हटाना तथा अहिंसा के व्रत का पालन करना—यही पीच्छी का वास्तविक प्रयोजन है।

यह उपकरण कोई आधुनिक आविष्कार नहीं है। जैन आगमों और दिगंबर परंपरा में इसका उल्लेख प्राचीन काल से मिलता है। हजारों वर्षों से यह मुनि-जीवन का अभिन्न अंग रहा है। इसलिए इसके संबंध में कोई भी टिप्पणी करने से पूर्व उसके धार्मिक, दार्शनिक और ऐतिहासिक पक्ष का अध्ययन किया जाना चाहिए।

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, प्रचार और अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। जब तक कोई परंपरा कानून-विरुद्ध या प्रत्यक्ष हिंसात्मक नहीं है, तब तक उसके विषय में तथ्यहीन आरोप समाज में भ्रम, अविश्वास और अनावश्यक वैमनस्य उत्पन्न कर सकते हैं। सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों का दायित्व सामान्य नागरिक की अपेक्षा अधिक होता है; उनके शब्द लाखों लोगों तक पहुँचते हैं। इसलिए उनके प्रत्येक वक्तव्य में तथ्यपरकता, संयम और उत्तरदायित्व अपेक्षित है।

मेनका गांधी पशु-कल्याण के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रही हैं। और उनका पशु पक्षी प्रेम भी जग हाजिर है किंतु इसका यह मतलब नहीं कि हम बिना किसी तथ्य के अनर्गल प्रलाप करें। ऐसे समाजसेवियों से तो समाज अधिक संतुलित, अध्ययनपरक और प्रमाणाधारित वक्तव्य की अपेक्षा करता है। यदि उन्हें पीच्छी या जैन मुनियों की परंपरा के संबंध में कोई शंका थी, तो उसका समाधान संवाद, अध्ययन और जैनाचार्यों से विमर्श के माध्यम से किया जा सकता था। संवाद सदैव समाधान का मार्ग प्रशस्त करता है, जबकि अधूरी जानकारी पर आधारित सार्वजनिक आरोप केवल भ्रम को जन्म देते हैं।

दिगंबर जैन मुनि किसी संस्था, सत्ता या संपत्ति के प्रतिनिधि नहीं होते; वे त्याग, तप, संयम और आत्मकल्याण के पथ के साधक होते हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य और आत्मशुद्धि का सजीव उदाहरण है। जिस साधु के हाथ की पीच्छी सूक्ष्म जीवों की रक्षा का प्रतीक हो, उसके संदर्भ में हिंसा का आरोप लगाने से पहले जैन दर्शन की उस विराट संवेदनशीलता को समझना आवश्यक है, जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति तक में जीवन का सम्मान करना सिखाती है।

आज आवश्यकता आरोपों की नहीं, अपितु अध्ययन की है; पूर्वाग्रह की नहीं, बल्कि संवाद की है; और आधे-अधूरे ज्ञान की नहीं, बल्कि सत्य की खोज की है। यदि हम भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं का सम्मान करना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें उन्हें समझना होगा। जैन दर्शन का मूल संदेश यही है—अहिंसा केवल आचरण नहीं, अपितु दृष्टि भी है; और सम्यक् दृष्टि का प्रथम चरण है—पूर्ण जानकारी के आधार पर विचार करना।

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम किसी धर्म या उसकी परंपराओं को अपनी सीमित जानकारी के आधार पर कठघरे में खड़ा करें; आवश्यकता इस बात की है कि हम उन्हें उनके मूल स्वरूप में समझने का विनम्र प्रयास करें। जैन दर्शन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि संवेदना का वह शिखर है जहाँ अहिंसा विचार बनकर नहीं, जीवन बनकर प्रवाहित होती है; जहाँ करुणा उपदेश नहीं, स्वभाव होती है; जहाँ दया प्रदर्शन नहीं, साधना होती है; और जहाँ प्रत्येक जीव के अस्तित्व का सम्मान आध्यात्मिक उत्तरदायित्व माना जाता है। जिस परंपरा ने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति तक में जीवन की अनुभूति कराई, जिसने मनुष्य को केवल हिंसा न करने का ही नहीं, अपितु हिंसा के भाव से भी मुक्त होने का संदेश दिया, उस परंपरा के साधुओं पर हिंसा का आरोप लगाने से पहले आत्ममंथन अपेक्षित है।

सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा जितनी बड़ी होती है, शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है। एक असावधान वक्तव्य क्षणिक हो सकता है, किन्तु उसके दुष्परिणाम समाज की चेतना में दीर्घकाल तक बने रहते हैं। मतभेद कभी भी संवाद के मार्ग में बाधा नहीं बनने चाहिए, किन्तु अज्ञान यदि अभिमान का रूप धारण कर ले तो वह समाज में अविश्वास और वैमनस्य के बीज बोता है। इसलिए अपेक्षा है कि मेनका गांधी जैसी अनुभवी एवं प्रभावशाली सार्वजनिक हस्ती जैन आगमों, दिगंबर मुनि-परंपरा तथा पीच्छी के वास्तविक स्वरूप का गंभीर अध्ययन करें और यदि उनका पूर्व कथन अधूरी जानकारी पर आधारित था, तो सत्य का सम्मान करते हुए उसे स्वीकार करने का नैतिक साहस भी प्रदर्शित करें। यही एक जिम्मेदार जननेता का आभूषण है।

भारत की आध्यात्मिक परंपराएँ शास्त्रार्थ की संस्कृति पर आधारित रही हैं, शोर-शराबे पर नहीं; प्रमाण पर आधारित रही हैं, पूर्वाग्रह पर नहीं; और सम्यक् ज्ञान पर आधारित रही हैं, आधे-अधूरे निष्कर्षों पर नहीं। इसलिए किसी भी धर्म का मूल्यांकन करने से पहले उसके सिद्धांतों की गहराई में उतरना आवश्यक है। विशेषकर जैन दर्शन का, जिसने विश्व को ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का ऐसा व्यावहारिक आदर्श दिया है, जिसकी प्रासंगिकता आज हिंसा, असहिष्णुता और वैचारिक उग्रता से जूझती मानवता के लिए पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। जैन मुनियों की पीच्छी मोर के पंखों का संग्रह मात्र नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के जीवन के प्रति करुणा, संवेदना और उत्तरदायित्व का सजीव प्रतीक है। इसे समझे बिना उस पर टिप्पणी करना न केवल तथ्य की त्रुटि है, बल्कि भारत की एक महान आध्यात्मिक परंपरा के साथ न्याय न कर पाने का भी द्योतक है।

– सुनील सुधाकर शास्त्री

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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