डिलिमिटेशन’ के बहाने महिला आरक्षण पर सियासी टकराव, विपक्ष ने बताया लोकतंत्र पर हमला

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नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में बनी राजनीतिक सहमति अचानक उलझन में बदल गई जब केंद्र सरकार ने इसे डिलिमिटेशन (सीटों के परिसीमन) से जोड़ दिया। विपक्षी दलों का कहना है कि इससे महिला आरक्षण की वास्तविक भावना कमजोर हो गई है और इसे लागू होने में लंबा समय लग सकता है।

विशेष सत्र के दूसरे दिन लोकसभा और राज्यसभा दोनों में यही विषय सत्तापक्ष और प्रतिद्वंद्वी दलों के बीच मुख्य विवाद बनकर उभरा। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार ने महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने के बजाय उसे “कार्यक्षमता की कठिन प्रक्रियाओं” में बांध दिया है।

कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और अन्य घटक दलों ने सरकार के प्रस्तावित संशोधनों का विरोध करते हुए कहा कि बढ़ती सीटों और जनगणना के आधार पर परिसीमन की शर्त को महिलाओं की प्रतिनिधित्व की “प्राथमिकता” पर लगाया जाना गलत है। उनका तर्क है कि देश भर में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण के हक़ के लिए विस्तृत सहमति है, लेकिन इसे प्रक्रियात्मक शर्तों के कारण नाजुक स्थिति में डाल दिया गया है।

लोकसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने कहा कि महिलाओं के नेतृत्व को सक्षम करने की मांग अब पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो चुकी है, लेकिन सरकार ने इसे “2011 की जनगणना”, “सीटों में बढ़ोतरी” और “डिलिमिटेशन प्रक्रिया” से जोड़कर एक गूढ़ प्रशासनिक पहेली बना दिया। थरूर ने कहा, “महिला आरक्षण को डिलिमिटेशन से जोड़ना ऐसा है मानो महिलाओं की आकांक्षाओं को जटिल और विवादित प्रशासकीय प्रक्रियाओं का शिकार बनाना।”

दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधियों ने विशेष चिंता जताई कि जनसंख्या आधारित परिसीमन बेहतर जनसंख्या नियंत्रण वाले राज्यों के ख़िलाफ़ जाना साबित होगा। डीएमके सांसद कनिमोझी ने कहा कि मध्य और उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत ने सफल परिवार नियोजन नीतियाँ अपनाई हैं, जिससे जनसंख्या वृद्धि दर कम है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में सामान अंतर प्राप्त करने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाना “संविधान के संघीय संतुलन” के प्रति असंगत है।

कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा ने कहा कि विपक्षी दलों ने महिलाओं के आरक्षण पर साफ़-सा समर्थन जताया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि परिसीमन की शर्त कब पूरी होगी और वह कितने समय में लागू होगी। उन्होंने कहा कि यह अस्पष्टता महिलाओं के हितों को नुकसान पहुँचा सकती है और सार्वजनिक विश्वास को भी झटका दे सकती है।

उधर सरकार का रूख़ यह है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए नए परिसीमन की आवश्यकता है क्योंकि सीटों की संख्या और संरचना में बदलाव के बिना लागू करना “आयुर्धिकारिक समता” के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा। केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने संवाददाताओं से कहा कि पिछला कानून लागू नहीं हुआ था और इसी वजह से बिल को नोटिफाई करते समय आवश्यक प्रक्रियाओं पर बल दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह एक विधायी और प्रशासनिक प्रक्रिया है जो समय लेगी, लेकिन अंततः सही तौर पर लागू होगी।

संसद की कार्यवाही के दौरान आम आदमी पार्टी के सांसदों ने भी कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी में मतभेद नहीं है, लेकिन प्रक्रिया की जटिलता बदली जा सकती है। राघव चड्ढा जैसे नेताओं ने कहा कि महिला आरक्षण को डिलिमिटेशन से अलग रखा जाना चाहिए ताकि यह जल्द प्रभावी हो सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिलिमिटेशन प्रक्रियाएँ—विशेष रूप से नई जनगणना के आधार पर—सामान्यतः वर्षों लेती हैं और मतभेदों की स्थिति में और भी अधिक जटिल हो सकती हैं। ऐसे में महिला आरक्षण के लागू होने की संभावना भविष्य तक टल सकती है, भले ही बिल विधारित हो चुका हो।

वहीं विपक्ष का यह भी कहना है कि चुनाव से पहले संवैधानिक संशोधन को “डिलिमिटेशन की शर्त” से बाँध देना राजनीति का साधन है, जो महिलाओं और छोटे दलों की उम्मीदों को ढक देता है।

आज संसद का माहौल टकरावपूर्ण बना हुआ है और यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार अविलंब इस विवादित शर्त को हटाकर बिल को जनता के सीधे हितों के अनुरूप कैसे लागू करेगी।

समाचार संकलन : युवराज कुमार (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)

YUVRAJ KUMAR
Author: YUVRAJ KUMAR

प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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