आज का युग शिक्षा का युग कहा जाता है, किंतु विडंबना यह है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य कहीं पीछे छूटता जा रहा है। शिक्षा, जो कभी मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण, संस्कार, नैतिकता और जीवनोपयोगी ज्ञान का माध्यम मानी जाती थी, आज धीरे-धीरे व्यवसाय का रूप ले चुकी है। छोटे-छोटे बच्चों के कंधों पर भारी पुस्तकों का बोझ डाल दिया गया है और बचपन प्रतियोगिता, अंक तथा फीस की दौड़ में कहीं खो गया है। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालय अब अनेक स्थानों पर व्यापारिक उद्योग बनते जा रहे हैं, जहाँ शिक्षा से अधिक महत्व फीस, विज्ञापन और दिखावे को दिया जा रहा है।
आज माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं। स्कूलों में वार्षिक शुल्क, परिवहन शुल्क, गतिविधि शुल्क और अन्य अनेक प्रकार के शुल्कों का बोझ परिवारों पर डाला जाता है। किंतु जब यह प्रश्न उठता है कि बच्चा विद्यालय से क्या सीखकर निकल रहा है, तब स्थिति चिंताजनक दिखाई देती है। आधुनिक शिक्षा बच्चों को परीक्षा में अंक लाने की कला तो सिखाती है, परंतु जीवन जीने की कला, नैतिक मूल्य, अनुशासन, सहनशीलता, नागरिकता और देशप्रेम जैसे मूलभूत संस्कार देने में पीछे रह जाती है।
प्राचीन भारत की शिक्षा व्यवस्था इससे बिल्कुल भिन्न थी। उस समय गुरुकुल प्रणाली प्रचलित थी, जहाँ विद्यार्थी ऋषि-मुनियों के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरुकुल केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं था, बल्कि जीवन निर्माण का आधार था। वहाँ विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ-साथ संयम, सेवा, त्याग, विनम्रता, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाया जाता था। विद्यार्थी प्रकृति के निकट रहकर श्रम का महत्व समझते थे और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को जान पाते थे। गुरुकुल से निकलने वाला विद्यार्थी केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि आदर्श नागरिक भी होता था।
इसके विपरीत आज की शिक्षा व्यवस्था में नैतिक शिक्षा और व्यवहारिक ज्ञान का अभाव दिखाई देता है। विद्यालयों में बच्चों को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने और परीक्षा में सफल होने के लिए तैयार किया जाता है। परिणामस्वरूप, अनेक छात्र डिग्री और प्रमाण पत्र तो प्राप्त कर लेते हैं, किंतु वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने में स्वयं को असहाय महसूस करते हैं। उन्हें न तो रोजगार के व्यावहारिक कौशल मिल पाते हैं और न ही समाज के प्रति जिम्मेदारी का बोध विकसित हो पाता है। यही कारण है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बड़ी संख्या में युवा बेरोजगार घूमते हैं या अपनी शिक्षा को अनुपयोगी मानने लगते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्ति का साधन न मानकर जीवन निर्माण का माध्यम बनाया जाए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करे। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा, व्यवहारिक प्रशिक्षण, श्रम की गरिमा, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रप्रेम जैसे विषयों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। बच्चों को केवल रटने की नहीं, बल्कि सोचने, समझने और जीवन में समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता विकसित करने वाली शिक्षा दी जानी चाहिए।
सरकार को भी इस दिशा में गंभीरता से विचार करना होगा। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को पूर्णतः सुलभ और गुणवत्तापूर्ण बनाना समय की आवश्यकता है। शिक्षा पर अनावश्यक व्यावसायिक नियंत्रण समाप्त होना चाहिए ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी समान अवसर प्राप्त कर सकें। साथ ही उच्च शिक्षा विद्यार्थियों की रुचि, योग्यता और समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप होनी चाहिए, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें और देश के विकास में योगदान दे सकें।
निस्संदेह, शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है। यदि शिक्षा ही आधारहीन और अनुपयोगी हो जाएगी, तो समाज और राष्ट्र का भविष्य भी कमजोर हो जाएगा। इसलिए आज समय की मांग है कि शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन किया जाए। ऐसी शिक्षा दी जाए जो केवल डिग्री नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार, मानवीय संवेदनाएँ, आत्मविश्वास और राष्ट्र निर्माण की चेतना प्रदान करे। तभी शिक्षा वास्तव में सार्थक कहलाएगी और देश का भविष्य उज्ज्वल बन सकेगा।
– अरविंद जैन









1 thought on “जीवन में अनुपयोगी आधारहीन शिक्षा”
गहन विचार। अत्यंत गंभीर, मंथन-मनन। और वास्तविक परिस्थिति। अरविंद जी, इतने महत्वपूर्ण विषय पर गंभीर चिंतन की अपेक्षा आप जैसे महान चिंतक से ही की जा सकती है।
बहुत बहुत बधाईया।
ईश्वर आपकी कलम की गहराई और ताकत को और सुदृढ़ करे, और ऊंचाइयां प्रदान करे। हजारों हजार शुभकामनाओं के साथ। आपका अपना।