मनुष्य ने सभ्यता के विकास में बहुत कुछ सीखा है—जीना, कमाना, सजना, संवरना, और अब… मरना भी “व्यवस्थित” ढंग से सीख लिया है। मृत्यु, जो कभी आत्मा की गंभीरतम अनुभूति और शोक की मौन भाषा हुआ करती थी, आज एक सुगठित आयोजन में परिवर्तित हो चुकी है। ऐसा प्रतीत होता है मानो जीवन का अंतिम अध्याय भी अब “इवेंट मैनेजमेंट” के अधीन आ गया हो—जहाँ भावनाएँ कम और व्यवस्थाएँ अधिक सक्रिय हैं।
हमारी परंपराओं में मृत्यु को लेकर एक गहरी दार्शनिक दृष्टि रही है। विशेषतः जैन दर्शन में मृत्यु को एक महोत्सव—आत्मा के बंधनों से मुक्त होने का उत्सव—माना गया है। यह विचार अत्यंत सूक्ष्म, आत्मिक और साधना से जुड़ा हुआ है। परंतु हमारे समाज ने इस शास्त्रोक्त विचार को जिस सहजता से ग्रहण किया है, वह अपने आप में एक अद्भुत “उपलब्धि” है। आत्मा की मुक्ति का यह गूढ़ सिद्धांत अब सचमुच एक “महोत्सव” में परिणत हो गया है—ढोल-नगाड़ों के बिना ही सही, परंतु पूरी आयोजन-शैली के साथ। लगता है मानो हमने दर्शन को नहीं, केवल उसके बाहरी रूप को आत्मसात किया है; और वह भी इतने उत्साह से कि शोक की परंपरा ही संदेह के घेरे में आ गई है।
कभी अंतिम यात्रा में जो मौन, गंभीरता और करुणा का संगम होता था, वह अब सजावट, प्रबंधन और भीड़-प्रदर्शन का विषय बन गया है। अर्थी अब केवल एक अंतिम विदाई नहीं रही, बल्कि एक सुसज्जित प्रस्तुति बन चुकी है—जहाँ फूलों की बहार है, पर भावनाओं का सूखा अकाल। “राम नाम सत्य है” की ध्वनि अब भी सुनाई देती है, पर उसमें वह कंपन नहीं रहा जो हृदय को भीतर तक झकझोर दे।
श्रद्धांजलि सभाएँ अब शोक की नहीं, वक्तृत्व कला की प्रतियोगिता प्रतीत होती हैं। मंच सजा है, माइक सुसज्जित है, और वक्ता अपने-अपने शब्दों से दिवंगत आत्मा के गुणों का ऐसा अलंकरण कर रहे हैं कि स्वयं दिवंगत भी यदि सुन लें तो आश्चर्य में पड़ जाएँ कि क्या सचमुच वे इतने महान थे! और यहाँ व्यंग्य का सबसे तीखा तीर वहीं जाकर लगता है, जहाँ जीवन भर माता-पिता को अपने घर में स्थान न देने वाले पुत्र, उनकी मृत्यु के बाद उनके सम्मान में “भव्य आयोजन” के मुख्य संयोजक बन जाते हैं। जीवित अवस्था में जिनके लिए एक गिलास पानी देना भी “व्यस्तता” के कारण संभव नहीं था, उनके नाम पर अब शरबत की टंकियाँ बह रही हैं। जिनकी आँखें एक कप चाय के लिए तरस गईं, उनके नाम पर अब मावे की खीर और पकवानों की श्रृंखला सजाई जा रही है। सच ही है—हमने सेवा का नहीं, स्मारक का महत्व अधिक समझ लिया है।
भोजन की व्यवस्था भी अब शोक की मर्यादा से निकलकर उत्सव की चकाचौंध में प्रवेश कर चुकी है। पहले जहाँ पंक्तिबद्ध बैठकर, संयमपूर्वक, मौन भाव से भोजन कराया जाता था, वहीं अब “बफर सिस्टम” ने उस परंपरा को अप्रासंगिक घोषित कर दिया है। अब शोक सभा में आए अतिथि प्लेट लेकर ऐसे विचरते हैं मानो किसी विवाह समारोह में सम्मिलित हों। पकवानों की विविधता देखकर मन में एक क्षण को यह संशय उत्पन्न हो ही जाता है कि यह अवसर शोक का है या स्वाद का। और “शुद्ध भोजन” की परिभाषा भी अब बदल चुकी है—शुद्धता अब आस्था से नहीं, ठेके से निर्धारित होती है। किसी एजेंसी को यह दायित्व सौंप दिया जाता है कि वह “शुद्धता” का प्रमाणपत्र भी स्वयं ही प्रस्तुत कर दे।
यह सब देखकर कभी-कभी लगता है कि हमने मृत्यु को नहीं, उसकी गरिमा को खो दिया है। हमने शोक को नहीं, उसकी सच्चाई को विस्मृत कर दिया है। और सबसे अधिक विडंबना यह है कि इस पूरे आयोजन में संवेदनाएँ कहीं कोने में बैठी, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही होती हैं।
परंतु इस व्यंग्य के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है—मृत्यु के बाद का यह समस्त आडंबर, यह समस्त प्रदर्शन, उस एक सत्य को नहीं बदल सकता कि हमने जीवन रहते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया या नहीं। यदि माता-पिता की वृद्धावस्था उपेक्षा में बीती, यदि उनके अंतिम दिनों में उन्हें सम्मान और स्नेह नहीं मिला, तो मृत्यु के बाद का यह “महोत्सव” केवल आत्मप्रवंचना है—एक ऐसा आवरण, जो सच्चाई को ढँक तो सकता है, मिटा नहीं सकता।
वास्तव में, धर्म का सार आयोजन में नहीं, आचरण में है। सच्ची श्रद्धांजलि फूलों की माला में नहीं, सेवा की ममता में है। यदि हम अपने पूर्वजों का आशीर्वाद चाहते हैं, तो वह किसी भव्य कार्यक्रम से नहीं, बल्कि उनके जीवित रहते हुए किए गए सम्मान और स्नेह से ही प्राप्त हो सकता है। अन्यथा, यह दिखावा केवल हमारे भीतर की रिक्तता को और अधिक उजागर करेगा।
और अंततः, यही स्मरण रखना होगा कि मृत्यु को महोत्सव बनाने की हमारी यह प्रवृत्ति, यदि संवेदनाओं से रिक्त रही, तो वह केवल एक सामाजिक अभिनय बनकर रह जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि हम इस “इवेंट संस्कृति” से बाहर निकलें और अपने संबंधों को उनकी मूल आत्मीयता में पुनः स्थापित करें। जब तक हमारे माता-पिता और परिजन हमारे साथ हैं, तब तक उनकी सेवा, उनका सम्मान, और उनका स्नेहपूर्वक पालन ही हमारा धर्म है—क्योंकि वही सच्चा महोत्सव है, वही सच्ची श्रद्धांजलि है, और वही जीवन की वास्तविक उपलब्धि है।








