ईरान में सत्ता का भविष्य: ख़ामेनेई की मौत के बाद राजनीतिक अनिश्चितता और क्षेत्रीय तनाव गहराया

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अमेरिका और इसराइल द्वारा चलाए गए संयुक्त सैन्य अभियान की शुरुआती लहर में ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की मौत ने देश को 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सबसे गंभीर मोड़ पर पहुँचा दिया है। इस ऑपरेशन में ईरान के कई वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक फैसले लेने वाले अधिकारियों को निशाना बनाया गया, जिससे सत्ता संरचना पर गहरा असर पड़ा है।

हमले की खबरें सामने आते ही ईरान तथा विदेशों में बसे प्रवासी ईरानी समुदाय से ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिनकी कल्पना कुछ ही दिन पहले करना मुश्किल था—कुछ जगहों पर लोग जश्न मनाते दिखाई दिए, तो कुछ जगहों पर इसे ऐतिहासिक बदलाव की उम्मीद के रूप में देखा गया।

अमेरिका और इसराइल के शीर्ष नेताओं ने इस घटना के बाद बेहद आक्रामक बयान दिए और ईरान के लोगों से मौजूदा शासन के खिलाफ आवाज़ उठाने का खुला आह्वान किया। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा “सरकार वापस लेने” की अपील और इसराइली प्रधानमंत्री द्वारा सत्ता परिवर्तन की आवश्यकता पर ज़ोर दिए जाने से क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है।

अंतरिम नेतृत्व की घोषणा, लेकिन अनिश्चितता बरकरार
रविवार सुबह ईरान के सरकारी मीडिया ने आधिकारिक रूप से अली ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि की और संविधान के तहत तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद को तत्काल कार्यकारी अधिकार सौंपने की घोषणा की। अधिकारियों ने प्रयास किया कि देश में स्थिरता का संदेश जाए, लेकिन ज़मीनी हालात इसकी उलटी तस्वीर दिखाते हैं।

हालाँकि ईरान में सर्वोच्च नेता के चयन की प्रक्रिया हमेशा से गोपनीय और बंद कमरों में होने वाली रही है, लेकिन इस बार स्थिति असामान्य है।
एक संभावित उत्तराधिकारी के रूप में वर्षों से ख़ामेनेई के बेटे मोजतबा का नाम सामने आता रहा है, लेकिन हमलों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कई प्रमुख कमांडरों के मारे जाने के बाद शक्ति-संतुलन बदल गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ दिनों में नए सर्वोच्च नेता के चयन की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ सकती है, लेकिन अंतिम नतीजा अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग भी हो सकता है—जैसा कि 1989 में ख़ामेनेई के चयन के समय हुआ था।

सैन्य ढाँचा कमजोर, लेकिन जवाब देने की क्षमता बरकरार
अमेरिका–इसराइल के हमले ने ईरान की सैन्य संरचना को झटका दिया है। कई अहम ठिकाने नष्ट हुए, शीर्ष नेतृत्व में खाई बनी और जनमानस में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

फिर भी, ईरान ने शुरुआती 48 घंटों में जवाबी कार्रवाई दिखाते हुए कई अरब देशों में अमेरिकी हितों और इसराइली ठिकानों को निशाना बनाया।
पहली बार मिसाइलें दुबई और कुवैत जैसे नागरिक इलाकों तक पहुँचीं, जिससे यह संकेत मिला कि संघर्ष का दायरा अब पहले से कहीं अधिक व्यापक है।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह संघर्ष और बढ़ा और ईरान-समर्थित क्षेत्रीय समूह इसमें कूद पड़े, तो तेहरान अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच युद्धविराम का रास्ता निकालने की कोशिश कर सकता है। लेकिन लंबे समय तक सैन्य दबाव और घरेलू असंतोष बढ़ा तो यह इस्लामिक गणराज्य के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

सुरक्षा तंत्र में बिखराव का जोखिम
ईरान की राजनीतिक स्थिरता काफी हद तक उसके सुरक्षा तंत्र पर टिकी है। यदि इस संकट के बीच सुरक्षा बलों या आईआरजीसी के भीतर मतभेद उभरते हैं या नेतृत्व के आदेशों का पालन करने में अनिच्छा दिखती है, तो यह मौजूदा शासन के लिए सीधा खतरा बन सकता है।

सबसे बड़ी चुनौती यही है—क्या सुरक्षा संस्थाएँ बिना अपने सर्वोच्च नेता के एकजुट रह पाएँगी?
वरना, यह संकट राजनीतिक अस्थिरता से बढ़कर शासन की जड़ों तक पहुँच सकता है।

ईरान एक निर्णायक मोड़ पर
ख़ामेनेई की मृत्यु और शीर्ष सैन्य अधिकारियों के मारे जाने के बाद ईरान ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जहाँ उसका राजनीतिक, सैन्य और सामाजिक ढाँचा पहले की तुलना में कहीं अधिक कमजोर और दबाव में है।

हालाँकि उसके पास संस्थागत संरचना, सशस्त्र बल और जवाबी क्षमता मौजूद है, लेकिन यह भी साफ है कि हालात सामान्य नहीं हैं।
अब ईरान का भविष्य इन सवालों पर टिक गया है—
• क्या अंतरिम नेतृत्व देश को स्थिर रख पाएगा?
• क्या जनता के विरोध प्रदर्शन फिर से उठेंगे?
• क्या सुरक्षा तंत्र नेतृत्व का साथ देगा?
• और सबसे महत्वपूर्ण—अमेरिका–इसराइल के साथ यह संघर्ष कितनी दूर तक जाएगा?

आने वाले कुछ दिन और हफ्ते तय करेंगे कि ईरान मौजूदा संकट से उभर पाएगा या यह घटना देश के राजनीतिक ढाँचे को एक नए दौर में ले जाएगी।

 

समाचार लेखक: युवराज कुमार (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)

YUVRAJ KUMAR
Author: YUVRAJ KUMAR

प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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