-जर्नलिस्ट डा.अखिल बंसल, जयपुर
माघ शुक्ल पंचमी को विद्या व बुद्धि की देवी वीणा वादिनी मां सरस्वती को ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के पश्चात् अपने तेज से उत्पन्न किया था; तभी से आज के दिन

पूजा अर्चना के साथ उनका जन्मदिन उत्साह पूर्वक मनाया जाने लगा। साहित्यकारों के लिए बसंत प्रकृति के सौन्दर्य और प्रणय के भावों की अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान करता है।
बसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा गया है। यह पंचमी बसंत पंचमी के नाम से जानी जाती है। वृक्षों के सूखे पात झड़ने से उनमें नई कोंपलें आने लगती हैं। रंग-बिरंगे फूलों से बगिया खिल उठती है ।खेतों में नई फैसलें पकने लगती हैं। सर्दी का पलायन होने से गुनगुनाती धूप सभी के मन को भाती है। बसंत पंचमी के दिन पीले रंग का प्रयोग आमतौर पर बहुतायत से देखा जाता है। हिंदू धर्म में इस रंग का बड़ा महत्व है । वैसे यह रंग डिप्रेशन को दूर करने वाला तथा आत्मविश्वास में वृद्धि करता है दिमाग को पूर्णतः सक्रिय करने वाला यह रंग आम लोगों को अत्यधिक पसंद है। बसंत पंचमी के दिन से ठंड की अनुभूति कम होने लगती है । छह ऋतुओं में यह रितु सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है । हवा में रंगों का उत्सव मनाने आज के दिन पतंग उड़ाई जाती है। आज ही के दिन सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह जी का विवाह हुआ था । आज ही के दिन छायावाद के प्रमुख कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल प्रांत के मेदनीपुर जिला स्थित महिषा दल में हुआ था। छंदों से मुक्त विधा में काव्य सृजन करने वाले वे पहले कवि थे।
आज से 40 दिन बाद होली का पर्व मनाया जाता है।
आज ही के पवित्र दिन अर्थात् माघ शुक्ल पंचमी ईसा पूर्व 108 में जैन परंपरा के प्रभावशाली व्यक्तित्व , मूलसंघ के प्रणेता आचार्य कुंदकुंद का जन्म आंध्र प्रदेश के कौंणकुंडपुरम में हुआ था। उनके पिता का नाम कर्मण्डू तथा माता का नाम श्रीमती था । जन्म स्थान का नाम कौंणकुंड होने से आप कुंदकुंद के नाम से विख्यात हुए ।
जैन समाज प्रत्येक शुभ कार्य में जिन चार मंगलों का स्मरण करता है उनमें भगवान महावीर तथा गौतम गणधर के पश्चात् आचार्य कुंदकुंद को मंगल स्वरूप माना गया है । श्लोक इस प्रकार है –
*मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमोगणी*
*मंगलं कुंदकुंदाद्यो,जैन धर्मोस्तु मंगलं*
इस श्लोक में कुंदकुंद का उल्लेख उनकी महनीय महत्ता का परिचायक है । श्रुतधर आचार्यों की परंपरा में उनको प्रमुख स्थान दिया गया है। उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण उनकी उत्तरवर्ती परंपरा मूल संघ और कुंदकुंद आम्नाय के नाम से लोक प्रसिद्ध हुई । सभी दिगंबर श्रमण अपने को कुंदकुंद आचार्य की परंपरा का कहलाने में गौरवान्वित होते हैं। दिगंबर जिनालयों में विराजमान समस्त जिनबिम्बों पर कुंदकुंद आम्नाय का उल्लेख पाया जाता है।
कुंदकुंद ने 11 वर्ष की अल्पायु में मुनि पद धारण कर लिया था । वे 33 वर्ष तक मुनि पद पर रहे इसके उपरांत 51 वर्ष 10 माह 15 दिन तक आचार्य पद को सुशोभित करते रहे। इस प्रकार उनकी आयु 95 वर्ष से अधिक थी।
विजयनगर के शक संवत् 1307 के एक अभिलेखांश में उनके पांच नाम- कुंदकुंद, वक्र ग्रीव, ऐलाचार्य, गृद्धपिच्छ और पद्मनंदी आए हैं । अभिलेखांश निम्न है- *आचार्य: कुंदकुंदाख्यो वक्र ग्रीवो महामुनि:।*
*एलाचार्यो गृद्धपिच्छ इति तन्नाम पंचधा।।*
षट् प्राभृत के टीकाकार श्रुतसागर सूरि की टीका के अंत में उक्त पांचों नाम निर्दिष्ट हैं। यही नाम नन्दि संघ की पट्टावली में भी उल्लिखित हैं। आचार्य पद्मनन्दी और कुंदकुंद इन दोनों नाम में प्रथम नाम आचार्य कुंदकुंद का पद्मनन्दी था एवं उत्तर नाम कुंदकुंद था । कुंदकुंद ग्रंथों के टीकाकार आचार्य जयसेन के अनुसार आचार्य कुंदकुंद कुमारनन्दी सिद्धांत देव के शिष्य थे । शुभचंद्र गुरवावली में प्राप्त उल्लेख के अनुसार भद्रबाहु के शिष्य माघनन्दी माघनन्दी के शिष्य जिनचन्द्र तथा जिनचन्द्र के शिष्य पद्मनन्दी थे ।नन्दी संघ पट्टावली के अनुसार भद्रबाहु द्वितीय ,गुप्तिगुप्त , माघनन्दी तथा जिनचन्द्र के बाद कुंदकुंद का उल्लेख आया है । इन दोनों पट्टावलियों के आधार पर कहा जा सकता है कि आचार्य कुंदकुंद के गुरु जिनचन्द्र थे । दादा गुरु माघनन्दी तथा श्रुतधर भद्रबाहु उनके गमक गुरु थे । यही पद्मनन्दी आचार्य कुंदकुंद के नाम से विख्यात हुए।
आचार्य कुंदकुंद का चिंतन अध्यात्म प्रधान था । वह उग्र विहारी तथा दुर्गम घाटियों व वनों में निर्भीक भाव से विहार करते थे । तीव्र तपश्चरण के परिणाम स्वरूप उन्हें चारण ऋद्धि प्राप्त थीं। आचार्य देवसेन(10 वीं शती) ने दर्शनसार में कुंदकुंदाचार्य के विदेह गमन की चर्चा करते हुए कहा है कि उन्हें महाविदेह में सीमंधर स्वामी से ज्ञानोपलब्धि हुई थी । आचार्य जयसेन ( 12 वीं शती) ने भी उनके विदेश गमन की घटना को प्रसिद्ध कथा कहा है । उनके विदेश गमन संबंधी घटना की चर्चा दसवीं शताब्दी के पूर्व जन सामान्य में प्रचलित थी। अनेक ग्रंथकार आचार्यों ने तो उक्त चर्चा की ही है ;अनेक शिलालेखों में भी आपको चारण ऋद्धिधारी बताया गया है ।
पोन्नूर नामक ग्रामें आपने तप किया था । पोन्नूर का अर्थ होता है- सोना अतः इसे हेम ग्राम भी कहा जाता है। यह चेन्नई के निकट स्थित है। आपकी तपोभूमि होने के कारण यहां भव्य जिनालय विद्यमान है ।
आचार्य कुंदकुंद की आत्मानुभूति परक वाणी ने अध्यात्म के नए क्षितिज का उद्घाटन किया और आगमिक तत्त्वों को तर्कसंगत परिधान में प्रस्तुत किया है । आचार्य कुंदकुंद ने अनेक ग्रंथों की रचना की है जिनमें – समयसार ,प्रवचनसार, नियमसार ,पंचास्तिकाय, अष्टपाहुड एवं वारसाणुवेक्खा मुख्य हैं। आपके द्वारा रचित समयसार को ग्रंथ राज कहा गया है।








