लोकतंत्र में पत्रकार को चौथा स्तंभ कहा जाता है। वह सत्ता से सवाल करता है, व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है और आम आदमी की आवाज को शासन के गलियारों तक पहुँचाता है। लेकिन जब वही पत्रकार उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचता है, जहाँ उसे सरकार से सम्मान और संवेदनशीलता की अपेक्षा होती है, तब यदि उसे अपनी सम्मान निधि के लिए तारीख-दर-तारीख इंतजार करना पड़े, तो यह केवल भुगतान में देरी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के चरित्र पर गंभीर सवाल है।
सरकारी कर्मचारियों के वेतन की तारीख तय है। पेंशन की प्रक्रिया निर्धारित है। विभिन्न सरकारी योजनाओं के भुगतान के लिए विभागीय व्यवस्था और समयसीमा बनाई जाती है। फिर दशकों तक पत्रकारिता के माध्यम से लोकतंत्र की सेवा करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की सम्मान निधि के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती कि उन्हें हर महीने निश्चित तारीख को राशि मिल जाए?
क्या वरिष्ठ पत्रकारों का सम्मान सरकारी कैलेंडर में किसी निश्चित तारीख का अधिकारी नहीं है?
यह सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं है। यह उन तमाम वरिष्ठ पत्रकारों का सवाल है जिन्होंने अपने जीवन के चार-पाँच दशक समाचारों के पीछे दौड़ते हुए, सत्ता से सवाल करते हुए, जनता की समस्याओं को उठाते हुए और समाज को जागरूक करते हुए गुजार दिए।
जिस उम्र में व्यक्ति को अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए निश्चित और सुरक्षित आर्थिक व्यवस्था की जरूरत होती है, उस उम्र में यदि उसे अपनी सम्मान निधि के लिए सरकारी दफ्तरों की ओर देखना पड़े और हर महीने यह पता लगाना पड़े कि पैसा आज आएगा या कल, तो इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी?
सम्मान की घोषणा आसान, सम्मान निभाना कठिन क्यों?
वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मान निधि की व्यवस्था करते समय सरकार ने निश्चित रूप से यह स्वीकार किया था कि पत्रकारिता केवल नौकरी या व्यवसाय नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति एक दीर्घकालिक सेवा है। फिर उस सेवा का सम्मान भी समयबद्ध और सम्मानजनक होना चाहिए।
सम्मान निधि कोई दान नहीं है। यह किसी पत्रकार पर सरकार की कृपा नहीं है। यह उस योगदान की राजकीय स्वीकृति है, जिसे पत्रकार ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों में अपने कर्म से अर्जित किया है।इसलिए जब सम्मान निधि समय पर नहीं मिलती, तो चोट केवल जेब पर नहीं लगती—सम्मान की भावना भी आहत होती है।
सरकार के पास व्यवस्था के लिए संसाधन हैं, इच्छा कहाँ है?
हर महीने सरकारी विभागों में हजारों-लाखों भुगतान निर्धारित प्रक्रिया से होते हैं। वेतन, पेंशन, भत्ते और दूसरी वित्तीय देनदारियों के लिए इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था विकसित हो चुकी है।
तो वरिष्ठ पत्रकारों की सम्मान निधि के लिए भी ऐसी स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती कि पात्र पत्रकारों को महीने की एक निश्चित तारीख को स्वतः भुगतान हो? यदि किसी कारण से भुगतान में विलंब हो रहा है तो विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि वह स्पष्ट रूप से बताए—
– भुगतान में देरी क्यों हुई?
– राशि किस स्तर पर लंबित है?
– भुगतान की निश्चित तारीख क्या है?
– भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या व्यवस्था की गई है?
एक वरिष्ठ पत्रकार को अपनी ही सम्मान निधि के लिए बार-बार जानकारी मांगने की स्थिति में क्यों रखा जाए? बुजुर्ग पत्रकारों से बाबूगिरी की परीक्षा क्यों?
सरकारें मंचों से पत्रकारों को लोकतंत्र का प्रहरी कहती हैं। राष्ट्रीय पर्वों और पत्रकारिता से जुड़े आयोजनों में वरिष्ठ पत्रकारों का सम्मान किया जाता है। उनके अनुभव और योगदान की प्रशंसा की जाती है। लेकिन असली सम्मान मंच पर माला पहनाने से नहीं, बल्कि आवश्यकता के समय व्यवस्था को संवेदनशील बनाने से दिखाई देता है।
यदि 60 वर्ष से अधिक आयु के पत्रकारों के लिए सम्मान निधि की योजना बनाई गई है तो उस योजना की सबसे बड़ी सफलता यही होनी चाहिए कि लाभार्थी पत्रकार को भुगतान के लिए कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। सम्मान समारोह एक दिन का होता है, लेकिन सम्मान की जिम्मेदारी हर महीने निभानी पड़ती है।
पत्रकारों का भी कोई ‘धनी-धोरी’ होना चाहिए
सरकारी कर्मचारियों के संगठन हैं। उनके अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाले मंच हैं। किसी सुविधा में विलंब होने पर प्रतिनिधिमंडल मिलता है, ज्ञापन जाता है और आवश्यकता पड़ने पर आंदोलन भी होता है। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अक्सर व्यक्तिगत रूप से अपनी समस्या लेकर विभागों के सामने खड़े दिखाई देते हैं।यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।
पत्रकार समाज को संगठित करने का काम करता रहा, लेकिन अपने हितों के लिए स्वयं संगठित नहीं हो पाया। शायद यही कारण है कि उसकी आवाज को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता, जितनी गंभीरता से वह दूसरों की आवाज को उठाता रहा है।
शासन को आईना कौन दिखाएगा?
पत्रकार का काम ही शासन को आईना दिखाना है। लेकिन कभी-कभी ऐसा समय भी आता है जब पत्रकारों को स्वयं शासन के सामने आईना रखना पड़ता है। आज वह समय आ गया है।
सरकार से केवल इतना पूछा जाना चाहिए कि यदि वरिष्ठ पत्रकारों के लिए सम्मान निधि की घोषणा सम्मान के उद्देश्य से की गई है, तो उस सम्मान को समय पर निभाने की व्यवस्था क्यों नहीं की गई? क्या एक निश्चित भुगतान तारीख तय करना इतना कठिन है?
क्या भुगतान में देरी होने पर संबंधित विभाग स्वतः सूचना नहीं दे सकता?क्या वरिष्ठ और वृद्ध पत्रकारों को हर महीने अपनी राशि के लिए इंतजार करना ही उनकी नियति है? और यदि सरकार अपने कर्मचारियों के वेतन को समय पर देने की व्यवस्था कर सकती है, तो वरिष्ठ पत्रकारों की सम्मान निधि के लिए भी वैसी ही प्राथमिकता क्यों नहीं हो सकती?
सरकार से अपेक्षा नहीं, अब जवाबदेही की मांग है
यह मुद्दा किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। यह उस व्यवस्था का प्रश्न है जो अपने नागरिकों के योगदान को सम्मान देने का दावा करती है। सरकार को चाहिए कि वरिष्ठ पत्रकारों की सम्मान निधि के लिए—
निश्चित भुगतान तारीख घोषित करे,समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करे,विलंब की स्थिति में जिम्मेदारी तय करे,और लाभार्थियों को अनावश्यक कार्यालयी प्रक्रिया से मुक्त करे।
क्योंकि जिसने पूरी जिंदगी व्यवस्था को आईना दिखाया है, उसे जीवन के अंतिम पड़ाव में व्यवस्था के सामने हाथ फैलाकर खड़ा करना किसी भी संवेदनशील लोकतंत्र के लिए शोभनीय नहीं है।
वरिष्ठ पत्रकार सम्मान निधि के लिए प्रतीक्षा नहीं, सम्मानजनक और समयबद्ध व्यवस्था चाहते हैं।
सरकार को यह समझना होगा कि यह कुछ हजार रुपयों का सवाल नहीं है।यह उस कलम के सम्मान का सवाल है, जिसने दशकों तक लोकतंत्र को जीवित रखने में अपनी स्याही खर्च की है।और अंत में शासन के लिए बस इतना—
जिस कलम ने जिंदगी भर सत्ता को आईना दिखाया,आज वही कलम सत्ता से अपना आईना देखने की अपेक्षा कर रही है। क्या शासन उस आईने में अपना चेहरा देखने के लिए तैयार है?
– डा. अखिल बंसल
अध्यक्ष-राजस्थान अधिस्वीकृत पत्रकार संघ






