क्षमा मनुष्य की कमजोरी नहीं, उसकी आंतरिक शक्ति है। यह केवल किसी की भूल को माफ कर देने का भाव नहीं, बल्कि अपने भीतर से क्रोध, अहंकार, वैर और प्रतिशोध को विसर्जित करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। जैन दर्शन ने इसी कारण क्षमा को धर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया है। क्षमाधर्म व्यक्ति के अंतर्मन को निर्मल करता है, उसके संबंधों में मधुरता लाता है और व्यापक रूप से समाज तथा विश्व में शांति की आधारभूमि तैयार करता है।
आज की दुनिया वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास और संचार की अभूतपूर्व गति के बावजूद तनाव और संघर्ष से मुक्त नहीं हो सकी है। परिवारों में मनमुटाव है, समाज में वैचारिक टकराव है और विश्व के अनेक हिस्सों में संघर्ष की स्थितियां बनी हुई हैं। ऐसे समय में क्षमाधर्म केवल आध्यात्मिक चिंतन का विषय नहीं, बल्कि मानवीय जीवन की एक बड़ी आवश्यकता बनकर सामने आता है।
क्षमा की पहली यात्रा मनुष्य के अपने भीतर से शुरू होती है। हम प्रायः दूसरों की भूलों को देखते हैं, लेकिन अपनी भूलों को स्वीकार करने में संकोच करते हैं। जबकि वास्तविक क्षमा वहीं से प्रारंभ होती है, जहां मनुष्य आत्मावलोकन करता है और यह स्वीकार करने का साहस जुटाता है कि उसके विचार, शब्द या व्यवहार से भी किसी को कष्ट पहुंचा हो सकता है।
यही कारण है कि क्षमा का संबंध आत्मशुद्धि से है। क्रोध और द्वेष को मन में संजोकर रखना स्वयं को ही निरंतर अशांत रखना है। प्रतिशोध की भावना बाहर से दूसरे को दंडित करने की इच्छा दिखाई देती है, लेकिन भीतर से वह स्वयं मनुष्य को बांधे रखती है। क्षमा उस बंधन को तोड़ने का मार्ग है।
‘मिच्छामि दुक्कडम्’ का भाव इसी आत्मावलोकन की प्रेरणा देता है। इसका सार केवल यह नहीं कि हम दूसरों से क्षमा मांगें, बल्कि यह भी है कि हम अपने भीतर झांकें, अपनी भूलों को पहचानें और भविष्य में उन्हें न दोहराने का संकल्प लें। इस दृष्टि से क्षमा धार्मिक औपचारिकता नहीं, आत्मपरिष्कार की सतत प्रक्रिया है।
लेकिन क्षमा का महत्व केवल व्यक्ति के अंतर्मन तक सीमित नहीं रहता। उसका अगला प्रभाव मानवीय संबंधों पर पड़ता है। परिवार और समाज में अनेक विवाद बड़ी घटनाओं से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे अहंकारों, गलतफहमियों और कटु शब्दों से पैदा होते हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी बात को ही अंतिम सत्य मानने लगता है, तब संवाद कमजोर होता है और संबंधों में दूरी बढ़ने लगती है।
ऐसे समय में क्षमा संबंधों को बचाने की शक्ति बन सकती है। क्षमा हमें अतीत की कटुता से बाहर निकलकर भविष्य की ओर देखने का अवसर देती है। पति-पत्नी, माता-पिता और संतान, मित्रों, सहकर्मियों तथा सामाजिक संबंधों में यदि भूल के बाद संवाद और क्षमा की गुंजाइश बनी रहे तो अनेक संबंध टूटने से बच सकते हैं।
यहां एक बात विशेष रूप से समझने की आवश्यकता है कि क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। अन्याय के विरुद्ध न्याय आवश्यक है और अपराध के लिए सामाजिक तथा कानूनी व्यवस्था का अपना महत्व है। लेकिन न्याय की आवश्यकता और मन में द्वेष बनाए रखना दो अलग बातें हैं। मनुष्य उचित कार्रवाई करते हुए भी अपने भीतर प्रतिशोध और घृणा को स्थायी स्थान देने से बच सकता है।
यही संतुलन क्षमा को अधिक व्यापक और व्यावहारिक बनाता है। क्षमा गलत को सही नहीं बनाती; वह गलत घटना को हमारे पूरे जीवन पर शासन करने से रोकती है।
आज के डिजिटल और सोशल मीडिया युग में इसकी आवश्यकता और बढ़ गई है। किसी टिप्पणी, संदेश या असहमति से क्षणभर में विवाद पैदा हो सकता है। कई बार हम शब्दों की चोट को वर्षों तक मन में रखते हैं। यदि प्रतिक्रिया देने से पहले संयम, संवाद और क्षमा का भाव आ जाए तो अनेक विवाद अपने प्रारंभिक स्तर पर ही समाप्त हो सकते हैं।
व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज तक क्षमा की यह यात्रा जब व्यापक होती है, तब इसका संबंध विश्व-शांति से जुड़ता है। आज राष्ट्रों और समुदायों के बीच भी संघर्ष का एक बड़ा कारण पुरानी कटुताओं, अविश्वास और प्रतिशोध की निरंतरता है। एक घटना दूसरी प्रतिक्रिया को जन्म देती है और प्रतिक्रिया फिर नई प्रतिक्रिया को। इस प्रकार संघर्ष का चक्र चलता रहता है।
ऐसे में क्षमा का अर्थ इतिहास को भूल जाना या अन्याय को नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि अतीत की कटुता को भविष्य की स्थायी नियति न बनने देना है। संवाद, सहिष्णुता, परस्पर सम्मान और क्षमा ऐसे मानवीय मूल्य हैं जो संघर्षों के बीच समाधान की संभावना को जीवित रखते हैं।
विश्व-शांति केवल हथियारों की संख्या कम करने से नहीं आएगी। शांति के लिए मनुष्य के भीतर भी शांति का संस्कार आवश्यक है। जिस व्यक्ति के भीतर निरंतर द्वेष है, वह अपने आसपास भी तनाव फैलाता है; इसके विपरीत शांत और क्षमाशील व्यक्ति संवाद के लिए स्थान बनाता है।
इसीलिए क्षमाधर्म की वास्तविक शक्ति व्यक्ति से विश्व तक जाती है—
मन में क्षमा आएगी तो आत्मशांति बढ़ेगी।
आत्मशांति से व्यवहार बदलेगा।
व्यवहार बदलने से संबंध मधुर होंगे।
मधुर संबंधों से समाज में सद्भाव बढ़ेगा।
और सद्भाव से विश्व-शांति की संभावना मजबूत होगी।
क्षमा करने के लिए साहस चाहिए। अपने अहंकार को पीछे रखना, अपनी पीड़ा के बावजूद वैर को आगे न बढ़ाना और संवाद का रास्ता खुला रखना आसान नहीं है। इसीलिए क्षमा को कमजोरी समझना उसके वास्तविक स्वरूप को न समझना है। क्षमा प्रतिशोध पर आत्मसंयम की विजय है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि क्षमा केवल किसी विशेष पर्व या अवसर पर दोहराया जाने वाला संदेश न रहे। वह हमारे दैनिक जीवन का संस्कार बने। हम अपनी भूल पर क्षमा मांगने में संकोच न करें और दूसरों की भूल को जीवनभर का वैर न बनाएं। जहां आवश्यक हो वहां न्याय के लिए खड़े हों, लेकिन न्याय की यात्रा को घृणा और प्रतिशोध की यात्रा न बनने दें।
जैन दर्शन का क्षमाधर्म इसी संतुलित जीवन-दृष्टि का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि आत्मशुद्धि और सामाजिक शांति अलग-अलग विषय नहीं हैं। जिस मनुष्य का अंतर्मन शांत होगा, उसके व्यवहार में भी शांति का प्रभाव दिखाई देगा; और जब ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ेगी तो समाज की प्रकृति भी बदलेगी।
इसलिए क्षमा का संदेश केवल जैन समाज का संदेश नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए एक सार्वभौमिक मानवीय मूल्य है। आज दुनिया को यदि अधिक संवेदनशील, सहिष्णु और शांत बनाना है तो क्षमा को धार्मिक अनुष्ठान से आगे ले जाकर जीवन-मूल्य बनाना होगा।
क्षमा मांगें, क्षमा करें और क्षमा को अपने आचरण का संस्कार बनाएं।
क्योंकि विश्वशांति का रास्ता केवल सीमाओं के बीच नहीं, मनुष्य के भीतर से होकर गुजरता है।
-डा. अखिल बंसल, जयपुर






