चंडीगढ़। वर्ष 2002 में हुए पत्रकार हत्याकांड से जुड़े मामले में गुरुवार को महत्वपूर्ण मोड़ आया।
गुरमीत राम रहीम को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया है।
यह निर्णय उस आजीवन कारावास की सज़ा के लगभग सात वर्ष बाद आया है, जिसे सीबीआई की विशेष अदालत ने सुनाया था।
अधिवक्ता ने निर्णय की पुष्टि की, पीड़ित पक्ष ने जताई नाराज़गी
डेरा प्रमुख की ओर से पक्ष प्रस्तुत करने वाले अधिवक्ता जीतेन्द्र खुराना ने बताया कि न्यायालय ने विस्तृत सुनवाई के बाद उनके मुवक्किल को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।
दूसरी ओर, मामले से प्रारंभ से जुड़े पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता लेखराज धोत ने इस निर्णय को निराशाजनक बताया।
उन्होंने कहा कि यह फैसला अब भारत का सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिया जाएगा।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के पुत्र अंशुल छत्रपति ने भी निर्णय पर असंतोष व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि वे 24 वर्षों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं और यह लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।
उन्होंने यह भी बताया कि न्यायालय के आदेश की प्रति मिलने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सज़ा किस आधार पर रद्द की गई।
अन्य दोषियों की सज़ा यथावत
अधिकारियों के अनुसार, इस मामले में दंडित अन्य तीन अभियुक्तों की सज़ा को यथावत रखा गया है।
इससे यह संकेत मिलता है कि जांच के दौरान कई साक्ष्य मज़बूत पाए गए थे, यद्यपि डेरा प्रमुख को राहत प्रदान कर दी गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
अक्टूबर 2002 में हरियाणा के सिरसा में ‘पूरा सच’ समाचारपत्र के संपादक रामचंद्र छत्रपति को उनके घर के बाहर गोली मारी गई थी।
उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ तीन दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई।
घटना के विरोध में सिरसा सहित कई स्थानों पर पत्रकारों ने धरना और प्रदर्शन किए।
परिवार ने प्रारंभिक पुलिस जांच पर असंतोष जताया और मामले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जांच कराने की माँग की।
जनवरी 2003 में पत्रकार के पुत्र ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसके बाद सीबीआई ने दिसंबर 2003 में इस मामले की जाँच आरंभ की।
इसी दौरान डेरा से जुड़े रणजीत सिंह की हत्या की जाँच भी इसी प्रकरण के अंतर्गत शामिल की गई।
वर्ष 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई जाँच को जारी रखने का आदेश दिया।
इस अवधि में बड़ी संख्या में डेरा समर्थकों ने चंडीगढ़ में विरोध प्रदर्शन भी किए।
पूर्व के न्यायिक निर्णय
अगस्त 2017 में साध्वी यौन शोषण प्रकरण में गुरमीत राम रहीम को दोषी ठहराते हुए दस-दस वर्ष की दो सज़ाएँ सुनाई गईं।
इसके पश्चात जनवरी 2019 में पत्रकार छत्रपति हत्याकांड में उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी।
अब उच्च न्यायालय ने उनके विरुद्ध हत्या के आरोपों को निरस्त कर दिया है, जबकि अन्य दोषियों की सज़ाएँ यथावत रहेंगी।
आगे की राह
पीड़ित पक्ष का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह मामला दोषमुक्त होने योग्य नहीं था और वे सर्वोच्च न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती देंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार, चूँकि गुरमीत राम रहीम पहले से ही यौन शोषण मामले में सज़ा काट रहे हैं, इसलिए इस निर्णय का उनके कुल कारावास पर तत्काल कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा।
फिर भी, इतने चर्चित मामले में आया यह निर्णय न्यायिक बहस का विषय अवश्य बनेगा।
समाचार लेखक: युवराज कुमार (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)









