रिश्ते जीवंत बनाइए

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22 मार्च, 2026: एक समय था जब गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होते ही बच्चों के मन में सबसे पहले ननिहाल, ददिहाल या गाँव जाने की खुशी उमड़ पड़ती थी। स्कूल बंद होते ही पूरा परिवार मामा, चाचा, ताऊ, बुआ या अन्य रिश्तेदारों के घर पहुँच जाता था। सीमित साधनों के बावजूद उन दिनों जीवन में अपनापन बहुत था। गाँव की खुली हवा, आम के पेड़ों की छाँव, कुएँ का पानी, चौपाल की बातें और रिश्तों की गर्माहट छुट्टियों को यादगार बना देती थी।

उस समय आय सीमित थी, सुविधाएँ कम थीं, लेकिन मन समृद्ध था। पर्यटन स्थलों पर घूमने की अपेक्षा रिश्तेदारों के घर जाना ही सबसे बड़ा आनंद माना जाता था। परिवार साथ बैठते थे, बच्चे मिलकर खेलते थे, महिलाएँ रसोई में हँसी-ठिठोली करती थीं और पुरुष देर रात तक जीवन के अनुभव बाँटते थे। रिश्तों में औपचारिकता नहीं, आत्मीयता होती थी। एक-दूसरे के सुख-दुख बिना कहे समझ लिए जाते थे।

आज समय बदल गया है। आय के साधन बढ़े हैं, सुविधाएँ बढ़ी हैं, यात्रा के विकल्प बढ़े हैं, लेकिन रिश्तों की निकटता कम होती जा रही है। छुट्टियाँ मिलते ही परिवार देश-विदेश की यात्राओं पर निकल पड़ते हैं, पर अपने ही रिश्तेदारों के घर जाने का समय नहीं निकाल पाते। आधुनिक जीवनशैली ने रिश्तों को धीरे-धीरे औपचारिक बना दिया है।

अब मुलाकातें अधिकतर विवाह, मांगलिक कार्यक्रमों या सामाजिक आयोजनों तक सीमित रह गई हैं। वहाँ भी पहले जैसी आत्मीयता दिखाई नहीं देती। कार्यक्रम रिसॉर्ट या आलीशान परिसरों में होते हैं, जहाँ हर परिवार अपने अलग कमरे में सीमित रहता है। निर्धारित समय पर बाहर आकर औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराता है और फिर अपने दायरे में लौट जाता है।

पहले धर्मशालाओं और सामुदायिक भवनों में एक साथ ठहरने की व्यवस्था होती थी। एक बड़े हाल में महिलाएँ, दूसरे में पुरुष और बच्चे—सब साथ रहते थे। रात भर हँसी-मजाक, बातचीत, गीत-संगीत और अपनापन वातावरण को जीवंत बनाए रखते थे। वही अवसर रिश्तों को गहरा करते थे। बच्चे अपने मामा, बुआ, चाचा, ताऊ और दूर के संबंधियों को पहचानना सीखते थे।

आज स्थिति यह है कि नई पीढ़ी अपने ही रिश्तेदारों को पहचान नहीं पाती। परिवार छोटे होते जा रहे हैं, एक या दो बच्चों तक सीमित हो चुके हैं, जिससे रिश्तों की पूरी श्रृंखला धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही है। आने वाले समय में यदि यही स्थिति रही तो अनेक रिश्ते केवल नामों तक सीमित रह जाएंगे।

जब भी अवसर मिले, रिश्तेदारों के घर अवश्य जाना चाहिए। बिना किसी विशेष कारण के भी मिलना-जुलना रिश्तों में जीवन बनाए रखता है। वहाँ कुछ दिन बिताने से मानसिक शांति मिलती है, एकाकीपन दूर होता है और अपनत्व का अनुभव होता है। कठिन समय में अपने ही लोग सबसे पहले साथ खड़े होते हैं।

देश-विदेश घूमना भी आवश्यक है, क्योंकि उससे नई जानकारियाँ मिलती हैं और दृष्टिकोण विस्तृत होता है, किंतु रिश्तों की कीमत पर नहीं। पहले रिश्तेदारी निभाना जरूरी है, क्योंकि यदि रिश्तों की गर्माहट समाप्त हो गई तो जीवन सुविधाओं से भरा होने पर भी भीतर से रिक्त रह जाएगा।

मानव जीवन में आत्मीय संबंध ही वास्तविक संपत्ति हैं। दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना, एक-दूसरे के सुख-दुख को समझना और अपनापन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यही संबंध जीवन को मानवीय बनाते हैं और यही हमारी सांस्कृतिक पहचान भी हैं।

— अरविंद जैन बीमा, उज्जैन

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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