डा. अखिल बंसल
10 जनवरी वह दिन जब दुनिया भर में फैले करोड़ों हिंदी प्रेमी अपनी भाषा के गौरव का उत्सव मनाते हैं। ‘विश्व हिंदी दिवस’ केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह इस बात का उद्घोष है कि हिंदी अब केवल भारत की सीमाओं में बंधी एक भाषा नहीं, बल्कि एक वैश्विक शक्ति बन चुकी है। फिजी से लेकर मॉरीशस तक और अमेरिका के सिलिकॉन वैली से लेकर यूरोप के विश्वविद्यालयों तक, हिंदी की गूंज आज पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली है।
हिंदी की इस वैश्विक यात्रा में सबसे बड़ा योगदान तकनीक और डिजिटल क्रांति का रहा है। एक समय था जब इंटरनेट पर अंग्रेजी का एकाधिकार था, लेकिन आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सोशल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन के दौर में हिंदी ने अपनी एक अनिवार्य जगह बना ली है। दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियाँ अब हिंदी भाषी बाजार को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। यह भाषाई बाजारवाद ही है जिसने हिंदी को आर्थिक सशक्तिकरण का जरिया बनाया है। आज हिंदी में ब्लॉगिंग, पॉडकास्टिंग और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर सृजित हो रहा मौलिक कंटेंट यह सिद्ध करता है कि हिंदी बोलने और समझने वाली आबादी एक विशाल बौद्धिक और आर्थिक शक्ति है।
हालांकि, इस वैश्विक विस्तार के बीच हमें आत्ममंथन की भी आवश्यकता है। क्या हम हिंदी को केवल भावनाओं और नारों की भाषा बनाए रखना चाहते हैं, या इसे ज्ञान-विज्ञान और शोध की भाषा के रूप में भी स्थापित करने के लिए तैयार हैं? अक्सर देखा जाता है कि उच्च शिक्षा, तकनीकी शब्दावली और न्यायालयों के कामकाज में हिंदी आज भी संघर्ष कर रही है। विश्व हिंदी दिवस की सार्थकता तभी है जब हम अपनी भाषा को ‘सम्पर्क भाषा’ के साथ-साथ ‘संसाधन भाषा’ बनाने की दिशा में ठोस प्रयास करें। हमें अनुवाद की निर्भरता से बाहर निकलकर मौलिक शोध और तकनीकी साहित्य हिंदी में रचने होंगे।
प्रवासी भारतीयों ने भी हिंदी को सात समंदर पार जीवित रखने और उसे प्रतिष्ठा दिलाने में अनुकरणीय भूमिका निभाई है। उनके लिए हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने की एक सांस्कृतिक डोर है। आज जब संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ रही है, तो यह हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।
अंततः, भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती, वह एक पूरी संस्कृति और जीवन दर्शन का संवाहक होती है। हिंदी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के भारतीय संस्कार को विश्व पटल पर अंकित करने वाली भाषा है। इसकी प्रकृति उदार है, जिसने समय-समय पर अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने भीतर आत्मसात किया है। आज के दिन हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम हिंदी को हीनता बोध से मुक्त कर आत्मविश्वास की भाषा बनाएंगे। हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते हम इसे संकुचित दायरों से निकालकर आधुनिकता और परंपरा के संगम के रूप में आगे बढ़ाएं।









