डा. अखिल बंसल
मकर संक्रांति भारत की प्राचीनतम और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व-परंपराओं में से एक है। यह पर्व केवल तिथि विशेष से नहीं, बल्कि सूर्य की गति और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, तब इस संक्रांति का आरंभहोता है। इसी कारण इसे मकर
संक्रांति कहा जाता है। यह पर्व सामान्यतः 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है और भारतीय पंचांग में इसका विशेष स्थान है।
मकर संक्रांति का मुख्य संदेश है- अंधकार से प्रकाश की ओर, शीत से उष्मा की ओर और निष्क्रियता से सक्रियता की ओर बढ़ना। इस दिन से सूर्य की उत्तरायण यात्रा आरंभहोती है, जिसे शुभ और मंगलकारी माना गया है। भारतीय परंपरा में उत्तरायण को सकारात्मक ऊर्जा, स्वास्थ्य और उन्नति का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि इस पर्व को नवचेतना और नवआरंभ का उत्सव भी कहा जाता है।
यह पर्व भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कहीं यह पोंगल के रूप में, कहीं उत्तरायण, क

हीं बिहू तो कहीं खिचड़ी पर्व के रूप में उल्लास के साथ मनाया जाता है। यद्यपि नाम और विधियाँ भिन्न हैं, किंतु भाव एक ही है-प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक समरसता। खेतों में नई फसल के आने पर किसान इस पर्व को विशेष आनंद के साथ मनाते हैं, जिससे यह पर्व कृषि संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। तिल-गुड़ के सेवन का वैज्ञानिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से महत्व है। शीत ऋतु में शरीर को ऊष्मा प्रदान करने वाले तिल और गुड़ स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं। साथ ही “तिल-गुड़ खाओ, मीठा-मीठा बोलो” की परंपरा सामाजिक सौहार्द, मधुर संबंधों और आपसी प्रेम का संदेश देती है।
इस दिन स्नान, दान और पुण्य कर्मों का विशेष महत्व माना गया है। नदियों में स्नान, गरीबों को वस्त्र, अन्न और धन का दान तथा सामूहिक भोज जैसे कार्य समाज में करुणा और सेवा की भावना को सुदृढ़ करते हैं। मकर संक्रांति हमें यह सिखाती है कि व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन भी आवश्यक है।
आज के आधुनिक और व्यस्त जीवन में भी मकर संक्रांति का संदेश उतना ही प्रासंगिक है। यह पर्व हमें प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन जीने, संतुलन बनाए रखने और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। बदलते समय में जब भौतिकता बढ़ रही है, तब यह पर्व सरलता, सौहार्द और सांस्कृतिक मूल्यों की याद दिलाता है।
हम कह सकते हैं कि मकर सक्रांति केवल एक पर्व नहीं है अपितु जीवन दर्शन है जो हमें परिवर्तन को स्वीकार करने, परिश्रम का सम्मान करने और सामूहिक खुशी को महत्व देने की सीख देता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की जीवंतता और एकता का सशक्त प्रतीक है।
जर्नलिस्ट डा. अखिल बंसल









