पटना, 6 अप्रैल। बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू होने के आज 10 वर्ष पूरे हो गए। 5 अप्रैल 2016 को लागू किया गया यह कानून मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रमुख नीतियों में शामिल रहा है।
शराबबंदी के एक दशक पूरे होने के अवसर पर राज्य में इस कानून की प्रभावशीलता को लेकर बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने कानून को लेकर सवाल उठाते हुए इसे आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि इससे राज्य को राजस्व का नुकसान हुआ है, जबकि अवैध शराब का कारोबार पूरी तरह समाप्त नहीं हो सका है।
वहीं, शराबबंदी से जुड़े मामलों की बढ़ती संख्या के कारण अदालतों पर भी दबाव बढ़ा है। न्यायिक प्रक्रिया में लंबित मामलों को लेकर कानूनी विशेषज्ञ इस कानून की समीक्षा की आवश्यकता जता रहे हैं।
इधर, 10वीं वर्षगांठ के मौके पर पुलिस और मद्य निषेध विभाग ने अवैध शराब के खिलाफ विशेष अभियान शुरू किया है। राज्य के विभिन्न जिलों में छापेमारी कर शराब की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी की कार्रवाई की जा रही है।
सरकार जहां शराबबंदी को सामाजिक सुधार की दिशा में एक सफल कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसके क्रियान्वयन और परिणामों पर सवाल उठाते हुए इसे पुनर्विचार योग्य मान रहा है।
– यश जयसवाल (प्रशिक्षु, मंगलयातन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)








