नई दिल्ली। लोकसभा में मंगलवार को उस समय राजनीतिक तनाव बढ़ गया जब विपक्ष द्वारा स्पीकर ओम बिड़ला को पद से हटाने के लिए लाया गया प्रस्ताव चर्चा के लिए स्वीकार कर लिया गया। प्रस्ताव स्वीकार होते ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सदन की कार्यवाही, निष्पक्षता और संसदीय परंपराओं को लेकर कड़ी बहस शुरू हो गई।
संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने प्रस्ताव को “लोकतांत्रिक संस्थाओं पर आघात” बताया, जबकि कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने कहा कि यह कदम “स्पीकर की निष्पक्षता की रक्षा” के लिए उठाया गया है।
प्रस्ताव पर कुल दस घंटे की चर्चा निर्धारित की गई है, जो बुधवार को भी जारी रहेगी और अंत में सदन में मतदान कराया जाएगा। चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप की भी संभावना जताई गई है।
प्रस्ताव पेश होते ही प्रक्रिया पर उठे सवाल
कार्यवाही की शुरुआत कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद द्वारा प्रस्ताव नोटिस पढ़ने से हुई।
इसके बाद कांग्रेस के सांसद के. सुरेश और मालू रवि ने प्रस्ताव का समर्थन किया।
चर्चा आरंभ होते ही एक प्रक्रियागत विवाद खड़ा हो गया। एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाया कि बहस का संचालन जगदम्बिका पाल कैसे कर सकते हैं, जबकि उन्हें स्वयं स्पीकर द्वारा अध्यक्ष पद की पैनल सूची में शामिल किया गया था।
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे और मंत्री रिजिजू ने इस आपत्ति को “निरर्थक” बताते हुए कहा कि अध्यक्ष की पैनल सूची में शामिल सदस्य सदन की कार्यवाही संचालित करने के पूर्णतः अधिकृत होते हैं।
कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार ने वर्षों से उपसभापति का पद खाली छोड़ रखा है, जिससे “संवैधानिक शून्य” की स्थिति बनी हुई है।
अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे सदस्य द्वारा समर्थन की माँग किए जाने पर 50 से अधिक सांसद खड़े हुए, जिसके बाद प्रस्ताव को चर्चा के लिए स्वीकार कर लिया गया।
गौरव गोगोई का आरोप—“संसद की गरिमा बचाने के लिए यह कदम जरूरी”
विपक्ष की ओर से बहस की शुरुआत करते हुए गौरव गोगोई ने कहा कि सदन में विपक्ष की आवाज़ दबाई जा रही है और कई महत्वपूर्ण विषयों को उठाने से रोका गया है।
उन्होंने कहा,
“हम दुख के साथ यह प्रस्ताव लेकर आए हैं, क्योंकि स्पीकर से हमारा व्यक्तिगत संबंध है। किंतु संसद की गरिमा और संविधान की रक्षा के लिए यह हमारा कर्तव्य है।”
गोगोई ने आरोप लगाया कि कई मौकों पर विपक्षी सदस्यों की टिप्पणियाँ रिकॉर्ड से हटाई गईं, जबकि सत्ता पक्ष के सदस्यों के कथन रिकॉर्ड में बने रहे।
उन्होंने कहा कि सदन में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान “लगातार बाधित” किया गया।
उनके अनुसार फरवरी माह में जब विपक्ष के नेता बोल रहे थे, उस समय 20 बार व्यवधान उत्पन्न हुए—कभी पीठासीन सदस्य की ओर से, कभी पैनल के सदस्यों द्वारा और कभी सत्ता पक्ष की ओर से।
गोगोई के शब्दों में,
“क्या यही संसदीय परंपरा है? माइक्रोफ़ोन का उपयोग विपक्ष को चुप करने के लिए नहीं होना चाहिए।”
रिजिजू ने आरोपों को पूरी तरह खारिज किया
संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि स्पीकर ने सदैव निष्पक्षता का पालन किया है।
उन्होंने कहा कि विपक्ष का प्रस्ताव “लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास” है और कांग्रेस “2014 के बाद से लगातार संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रही है।”
रिजिजू ने यह भी कहा कि स्पीकर ने अपने कार्यकाल में संसद के आधुनिकीकरण के लिए कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं, जिनमें कागज़रहित कार्यवाही की दिशा में कदम और युवा सांसदों को अधिक अवसर देना शामिल है।
मंत्री ने दावा किया कि विपक्ष को प्रश्न पूछने, विषय उठाने और पूरक प्रश्न पूछने का पूरा अवसर दिया गया, इसलिए पक्षपात के आरोप निराधार हैं।
बुधवार को जारी रहेगी चर्चा
सदन में प्रस्तुत यह प्रस्ताव दुर्लभ घटनाओं में से एक है और पूरे राजनीतिक परिदृश्य में इसकी व्यापक चर्चा हो रही है।
बुधवार को बहस के दूसरे चरण में दोनों पक्ष अपनी दलीलें प्रस्तुत करेंगे और अंत में मतदान के बाद सदन निर्णय देगा।
समाचार लेखक: युवराज कुमार (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)









