ऋषभदेव : भरत के रूप में ‘भारत’ की प्रामाणिक परंपरा

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भारतीय आध्यात्मिक चेतना में भगवान ऋषभदेव का स्थान आद्य प्रवर्तक के रूप में है। उन्होंने केवल मोक्षमार्ग का ही उपदेश नहीं दिया, बल्कि सामाजिक संगठन, श्रम-विभाजन और सांस्कृतिक जीवन की आधारशिला रखी। उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती सम्राट बने—और जैन परंपरा के अनुसार उनके ही नाम पर यह भूभाग भारतवर्ष कहलाया।

इतिहास और परंपरा के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ‘भरत’ नाम की प्राचीनता निर्विवाद है, परंतु उसे विशेष रूप से ऋषभदेव-पुत्र भरत से जोड़ने के प्रमाण जैन साहित्य में अधिक सुस्पष्ट और निरंतर मिलते हैं। जैन आगम, पुराण और चरित्रग्रंथों में भरत चक्रवर्ती का विस्तार से वर्णन है—उनकी दिग्विजय, चक्ररत्न की प्राप्ति और अंततः वैराग्य का प्रसंग।

ओडिशा के हाथीगुम्फा शिलालेख, जिसे कलिंग के राजा खारवेल ने उत्कीर्ण कराया, जैन परंपरा की प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक साक्ष्य है। इससे यह सिद्ध होता है कि ईसा पूर्व पहली शताब्दी तक आदिनाथ और उनकी परंपरा की स्मृति राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन में विद्यमान थी।

वैदिक साहित्य—विशेषतः ऋग्वेद—में ‘भरत’ जन का उल्लेख अवश्य मिलता है, परंतु वहाँ ‘भारत’ नाम का प्रत्यक्ष और स्पष्ट भौगोलिक प्रयोग उतनी स्पष्टता से नहीं मिलता जितना जैन परंपरा में ‘भरत चक्रवर्ती’ के माध्यम से मिलता है। अतः यदि प्रत्यक्ष नामकरण-परंपरा की दृष्टि से देखा जाए, तो ऋषभदेव-पुत्र भरत के साथ ‘भारतवर्ष’ की संगति अधिक सुसंगत और परंपरागत रूप से प्रमाणित प्रतीत होती है।

जैन ग्रंथों में भरत को चक्रवर्ती सम्राट के रूप में वर्णित किया गया है, जिनके शासन में संपूर्ण आर्यावर्त एकीकृत हुआ। ‘भारतवर्ष’ शब्द उसी सार्वभौम सत्ता और धर्माधारित शासन की स्मृति का द्योतक है। यह केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि धर्म, संयम और न्याय पर आधारित राज्य-व्यवस्था का प्रतीक है।

ऋषभदेव द्वारा प्रतिपादित अहिंसा और अपरिग्रह के सिद्धांत आज भी भारत की आत्मा का आधार हैं। यदि ‘भारत’ नाम भरत चक्रवर्ती से जुड़ा है, तो उसका आध्यात्मिक मूल भी ऋषभदेव के संयम और धर्म में निहित है। इस दृष्टि से राष्ट्र की पहचान केवल ऐतिहासिक विमर्श नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व भी है।

भारतवर्ष’ नाम की व्याख्या विविध परंपराओं में भिन्न-भिन्न रूप से की गई है, किंतु ऋषभदेव-पुत्र भरत के रूप में इसके साक्ष्य जैन साहित्य और ऐतिहासिक संकेतों में अधिक सुस्पष्ट, निरंतर और संगत मिलते हैं।आज आवश्यकता है कि हम इस नाम के आध्यात्मिक आशय को समझें—अहिंसा, संयम और धर्माधारित जीवन—और उसे राष्ट्रीय चरित्र का आधार बनाएं। तभी ‘भारत’ अपने नाम के अनुरूप विश्व में नैतिक आदर्श स्थापित कर सकेगा।

      – डा. अखिल बंसल

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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