कभी विवाह दो परिवारों का पवित्र मिलन होता था। संस्कार, सादगी और आत्मीयता उसकी पहचान थे। घर की चौखट पर हल्दी की महक, आँगन में गूंजती शहनाई, मंदिर में मंत्रोच्चार और सीमित लोगों की उपस्थिति—इतना ही पर्याप्त था। विवाह का अर्थ था संबंधों का विस्तार, न कि खर्चों का प्रदर्शन।
परंतु आज विवाह एक संस्कार से अधिक “प्रोजेक्ट” बन गया है। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियाँ, थीम डेकोरेशन, डेस्टिनेशन वेडिंग, ड्रोन शूट, कोरियोग्राफर, पाँच-पाँच फंक्शन—सब मिलकर विवाह को एक ऐसे आयोजन में बदल देते हैं जहाँ भावनाएँ पीछे छूट जाती हैं और दिखावा आगे आ जाता है।
मध्यम वर्ग के लिए यह दिखावा धीरे-धीरे एक सामाजिक दबाव बन चुका है। “लोग क्या कहेंगे?”—यह वाक्य आज लाखों परिवारों को कर्ज़ में धकेल रहा है।
सादगी से आडंबर तक का सफर
पहले गाँव में एक सार्वजनिक विवाह होता था। बाकी रस्में घर की चारदीवारी में 10-15 अपनों के बीच सम्पन्न होती थीं। मंदिर में फेरे, घर पर सादा भोजन, और खर्च 50-70 हज़ार में सीमित। सम्मान भी बना रहता था और भविष्य भी सुरक्षित।
आज एक सामान्य मध्यमवर्गीय विवाह का अनुमानित खर्च 30-45 लाख तक पहुँच चुका है। दोनों पक्ष मिलाकर यह राशि 60-90 लाख तक हो जाती है। सगाई से लेकर रिसेप्शन तक हर कार्यक्रम अलग, हर समारोह में अलग सजावट, अलग कैटरिंग, अलग कपड़े।
यदि किसी परिवार की मासिक आय 50-70 हज़ार है, तो 60-90 लाख का खर्च उनकी 10-12 वर्षों की पूरी कमाई के बराबर है। क्या एक रात की चमक के लिए 10 वर्षों का परिश्रम दांव पर लगाना उचित है?
दिखावे की कीमत
मैंने पिछले कुछ वर्षों में अनेक परिवारों को देखा है—शादी के बाद घर तो वही रहा, पर घरवाले टूट गए।
ज़मीन बिक गई
माँ के गहने गिरवी पड़ गए
पिता कर्ज़ के बोझ तले दब गए
EMI ने चैन की नींद छीन ली
शादी की विदाई के बाद माँ की आँखों में आँसू होते हैं, पर वह खुशी के नहीं, भविष्य की चिंता के होते हैं। पिता रात को छत निहारते हुए सोचते हैं—अब कर्ज़ कैसे चुकाऊँगा?
विवाह के मंच पर हजारों लोगों की भीड़ होती है, पर मुसीबत के समय वही लोग कहीं दिखाई नहीं देते। न रिश्तेदार आते हैं, न डीजे वाला। तब काम आता है केवल बैंक बैलेंस और आर्थिक सुरक्षा।
सोशल मीडिया का भ्रम
टीवी सीरियल और इंस्टाग्राम रील्स ने विवाह की परिभाषा बदल दी है। अब शादी बड़ी नहीं, “इवेंट” बड़ा होना चाहिए। दूल्हा-दुल्हन की एंट्री फिल्मी हो, फोटोशूट विदेशी लोकेशन जैसा लगे, और हर पल सोशल मीडिया पर वायरल हो—यह मानसिकता हमें अंदर से खोखला कर रही है।
पर सच्चाई यह है कि विवाह का असली गवाह मंदिर होता है, कैमरा नहीं।
विवाह का असली आशीर्वाद माता-पिता का हाथ होता है, ड्रोन शॉट नहीं।
विवाह के बाद का सुकून कर्ज़मुक्त नींद में मिलता है, पाँच सितारा रिसेप्शन में नहीं।
दहेज और सामाजिक दबाव
दहेज आज भी अनेक स्थानों पर एक कड़वी सच्चाई है। 10-20 लाख की अतिरिक्त मांग मध्यमवर्गीय परिवार को और अधिक संकट में डाल देती है। बेटी की शादी माता-पिता के लिए सम्मान का विषय है, पर जब यह सम्मान “कर्ज़” में बदल जाता है, तब समाज को आत्ममंथन करना चाहिए।
समाधान क्या है?
समस्या का समाधान समाज के सामूहिक संकल्प में है।
सादगीपूर्ण विवाह को सम्मान दें।
सामूहिक विवाह और सामूहिक भोज को बढ़ावा दें।
अनावश्यक रस्मों और दिखावे को सीमित करें।
वरिष्ठजन, संत-महात्मा और सामाजिक संस्थाएँ पहल करें।
दहेज का खुलकर विरोध करें।
यदि विवाह केवल मंदिर में फेरे और घर पर 200-300 लोगों के स्नेहपूर्ण भोजन तक सीमित रहे, तो कुल खर्च 2-3 लाख में सम्पन्न हो सकता है। सम्मान भी बचेगा, जमीन भी बचेगी, और सबसे बड़ी बात—परिवार का मानसिक संतुलन भी सुरक्षित रहेगा।
असली पुण्य क्या है?
आज का सबसे बड़ा पुण्य यह नहीं कि आपने विवाह में लाखों खर्च किए।
सबसे बड़ा पुण्य यह है कि आपने अपनी संतान को कर्ज़मुक्त भविष्य दिया।
समाज के वरिष्ठ जनों, महात्माओं और संतों को चाहिए कि वे विवाह में धन की बर्बादी और दिखावे पर रोक लगाने का अभियान चलाएँ। जैसे कभी समाज ने बाल विवाह और अन्य कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, वैसे ही अब अत्यधिक विवाह खर्च के विरुद्ध जनजागरण आवश्यक है।
हर उस पिता तक यह संदेश पहुँचना चाहिए जो आज रात छत की ओर देखकर सोच रहा है—
“बेटी या बेटे की शादी कैसे होगी?”
उसे यह भरोसा मिलना चाहिए कि समाज उसके साथ है। कि सादगी में भी सम्मान है। कि कम खर्च में भी विवाह उतना ही पवित्र और सफल हो सकता है।
निष्कर्ष
विवाह जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, परंतु वह जीवन से बड़ा नहीं है।
एक रात की चकाचौंध के लिए वर्षों की कमाई और मानसिक शांति को दांव पर लगाना बुद्धिमानी नहीं।
आइए संकल्प लें—
विवाह को फिर से संस्कार बनाएँ, व्यापार नहीं।
सादगी को प्रतिष्ठा दें, दिखावे को नहीं।
और आने वाली पीढ़ी को ऐसा समाज दें जहाँ विवाह खुशी का कारण बने, बर्बादी का नहीं।
आज का सबसे बड़ा पुण्य – एक पिता की चिंता कम करना।
– अरविंद जैन “बीमा”
20, शंकु मार्ग फ्रीगंज उज्जैन
समाचार संकलन: युवराज कुमार (प्रशिक्षु मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)









