एक बार की बात है।
बाबू युगलजी सोनगढ़ शिविर के लिए रेल यात्रा पर निकले थे। साधारण-सी यात्रा, कोई आरक्षित डिब्बा नहीं—केवल भारतीय रेल का जनरल डिब्बा, जहाँ जीवन अपने पूरे यथार्थ के साथ सांस लेता है।
डिब्बा यात्रियों की भीड़ से भरा हुआ था। कहीं बैठने की जगह नहीं थी , न ही कहीं सांस लेने की। पसीने, आवाज़ों, थके चेहरों और भागती ज़िंदगी के बीच बाबू युगलजी एक कोने में चुपचाप बैठे थे। उनके पास में न कोई सुविधा थी, न शांति—पर उनके हृदय में देव शास्त्र गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा थी।
इसी भीड़, शोर और असुविधा के बीच उनकी कलम चलने लगी।
जनरल डिब्बे की कठोर बेंच पर बैठकर उन्होंने प्रसिद्ध देव-शास्त्रज्ञ गुरु-पूजन की रचना की। बाहर रेल की पटरियों की आवाज़ थी, भीतर शब्दों की साधना।
वह दृश्य अद्भुत था—
जहाँ लोग जगह के लिए लड़ रहे थे, वहाँ एक संत हृदय देव-शास्त्र- गुरु की भक्ति में लीन था।
जहाँ संसार भाग रहा था, वहाँ साधना ठहर गई थी।
यह रचना हमें सिखाती है कि
साधना को सुविधा की आवश्यकता नहीं होती,
और सच्ची भक्ति किसी शांत कक्ष की मोहताज नहीं होती।
देव शास्त्र गुरु-पूजन केवल शब्द नहीं थें,
वह उस जनरल डिब्बे में बैठी हुई श्रद्धा, त्याग और समर्पण की जीवंत अभिव्यक्ति थी।








