गुना सीमंधर जिनालय प्रकरण : क्या आस्था, इतिहास और परम्परा की रक्षा का प्रश्न है?

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मध्यप्रदेश के गुना नगर में स्थित सीमंधर जिनालय को लेकर इन दिनों जो विवाद सामने आया है, उसने केवल स्थानीय समाज को ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज को चिंतन के लिए विवश कर दिया है। यह प्रकरण किसी व्यक्ति विशेष, किसी संत विशेष अथवा दो विचारधाराओं के बीच मतभेद का विषय भर नहीं है; यह प्रश्न जैन समाज की धार्मिक मर्यादाओं, ऐतिहासिक सत्य और आस्था केन्द्रों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार गुना का सीमंधर जिनालय आध्यात्मिक जैन संत श्री कानजीस्वामी की जिनवाणी प्रभावना से प्रेरित स्थानीय मुमुक्षु समाज द्वारा देश के अनेक मुमुक्षु भाइयों के सहयोग से निर्मित कराया गया था। जिनबिम्बों की प्राण-प्रतिष्ठा आगमोक्त विधि ब्रह्मचारी अभिनंदन कुमार जी द्वारा सम्पन्न कराई गई थी। वर्षों से यह जिनालय उसी स्वरूप में श्रद्धालुओं की आराधना का केन्द्र रहा।

समाचारों तथा सोशल मीडिया पर प्रसारित जानकारी के अनुसार जिनालय में विराजमान जिनबिम्बों की पुरानी प्रशस्तियों को हटाकर नई प्रशस्तियां स्थापित करने तथा पुनः पंचकल्याणक सम्पन्न कराने की तैयारी की जा रही है। यदि ऐसा वास्तव में किया जा रहा है तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि अनेक गंभीर धार्मिक और नैतिक प्रश्नों को जन्म देता है।

जैन परम्परा में प्रतिष्ठित जिनबिम्ब केवल पत्थर की मूर्तियाँ नहीं होती, वे श्रद्धा, तप, त्याग और साधना के प्रतीक होते हैं। उनकी प्रशस्तियाँ उस इतिहास की साक्षी होती हैं जिसमें दानदाताओं, निर्माताओं और प्रतिष्ठा कराने वालों की भावनायें अंकित रहती हैं। किसी प्रशस्ति को मिटाना अथवा बदलना केवल कुछ शब्दों को हटाना नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक स्मृति को प्रभावित करना है जो आने वाली पीढ़ियों को सत्य से परिचित कराती है। आगम भी प्रतिष्ठित मूर्तियों पर छैनी-हथौडा चलाने की अनुमति नहीं देता।

जैन आगमों और परम्पराओं में प्रतिष्ठित जिनबिम्बों के प्रति अत्यन्त विनय और सावधानी का विधान है। यदि किसी प्रतिष्ठित प्रतिमा पर पुनः छेड़छाड़, पुनर्प्रतिष्ठा अथवा उसकी मूल पहचान बदलने जैसे कार्य किए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या यह आगमिक मर्यादाओं के अनुरूप है? इस विषय पर समाज के विद्वानों, आचार्यों और आगम विशेषज्ञों को स्पष्ट मार्गदर्शन देना चाहिए ताकि भावनाओं के स्थान पर सिद्धांतों के आधार पर निर्णय हो सके।

इस प्रकरण का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक है। बताया जा रहा है कि जिनालय के निर्माण में मुमुक्षु समाज का प्रमुख योगदान रहा तथा कुछ जिनबिम्बों को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। यदि किसी अल्पसंख्यक धार्मिक समूह की भावनाओं की उपेक्षा करके बहुसंख्यक प्रभाव के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं, तो यह समाज में स्थायी कटुता और अविश्वास को जन्म दे सकता है। धर्म का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, विभाजित करना नहीं।

यह भी स्मरण रखना होगा कि यदि आज किसी स्थापित जिनालय की मूल पहचान बदली जाती है, तो भविष्य में यही प्रवृत्ति अन्य स्थानों पर भी दोहराई जा सकती है। तब किसी भी समाज, संस्था या परम्परा को यह विश्वास नहीं रहेगा कि उनके पूर्वजों द्वारा निर्मित धार्मिक केन्द्र अपनी मूल ऐतिहासिक पहचान सुरक्षित रख पाएंगे। यह एक ऐसी परम्परा का आरम्भ हो सकता है जिसके दूरगामी परिणाम अत्यन्त गंभीर होंगे।

इस विषय को किसी संत या सम्प्रदाय के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। । श्री कानजीस्वामी परम्परा के अनुयायियों की भी अपनी धार्मिक मान्यताएँ और भावनाएँ हैं। अतः समाधान का मार्ग टकराव नहीं, बल्कि संवाद, पारदर्शिता और धार्मिक मर्यादाओं के सम्मान से निकलेगा।

आज आवश्यकता है कि समाज की राष्ट्रीय संस्थाएँ, विद्वान, आगम विशेषज्ञ और जिम्मेदार नेतृत्व इस विषय का निष्पक्ष परीक्षण करें। यदि कहीं ऐतिहासिक तथ्यों, आगमिक मर्यादाओं या किसी समाज की भावनाओं की उपेक्षा हो रही है, तो समय रहते उसका समाधान खोजा जाए। क्योंकि आस्था पर अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व होता है।

इतिहास मिटाकर नया इतिहास नहीं बनाया जा सकता। श्रद्धा का सम्मान और परम्परा की रक्षा ही किसी भी धर्म की वास्तविक शक्ति होती है। गुना प्रकरण हमें यही स्मरण कराता है कि मतभेदों से ऊपर उठकर जिनशासन की मर्यादा, सत्य और विनय को सर्वोपरि रखना ही हम सबका सामूहिक दायित्व है। आज जैन समाज में एकता स्थापित करने के प्रयत्न किये जा रहे, ऐसे में गुना का यह प्रकरण कहीं समाज तोडने का हेतु न बन जाए।

— जर्नलिस्ट डॉ. अखिल बंसल

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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