महिला आरक्षण और परिसीमन पर संसद में संग्राम तेज, बिल पारित होने से ठीक पहले घमासान बढ़ा

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नई दिल्ली। देश की संसद में आज का दिन उस वक्त ऐतिहासिक बन सकता था जब महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करने वाले विधेयक पर अंतिम मुहर लगनी थी। लेकिन जिस बिल को लेकर सरकार “नारी शक्ति के सशक्तिकरण” का दावा कर रही है, उसी बिल के साथ जोड़ा गया परिसीमन का मुद्दा पूरे राजनीतिक वातावरण को गरमाए हुए है।

विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने महिला आरक्षण के नाम पर एक ऐसा जटिल रास्ता बना दिया है, जिसमें असली क्रियान्वयन न जाने कितने वर्षों तक टल सकता है।

संसद के विशेष सत्र में सुबह से ही दोनों सदनों में हलचल बढ़ी रही। विपक्षी दलों ने कहा कि बिल का असली सार तब खत्म हो गया, जब इसे 2026 के बाद नए परिसीमन, 2011 की जनगणना, और लोकसभा की सीटों में संभावित बढ़ोतरी जैसे विवादित प्रावधानों से जोड़ दिया गया।

लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, जेडीयू समेत कई विपक्षी दलों ने सरकार पर “कानून पास करने की जल्दी में कानूनी पेचीदगियाँ बढ़ाने” का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यह आरक्षण अभी से लागू किया जा सकता है, लेकिन सरकार जानबूझकर इसे नई जनगणना और नए परिसीमन पर टिका रही है, ताकि महिलाओं को वास्तविक रूप से प्रतिनिधित्व देने में देरी हो।

उधर सरकार का दावा है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए “सीट संरचना में बदलाव अनिवार्य है”, इसलिए प्रक्रिया का पालन करना ही पड़ेगा।

राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने भी चर्चा के दौरान कहा कि कई दल महिला आरक्षण के समर्थन में हैं, मगर उसे परिसीमन से जोड़ना इस ऐतिहासिक कदम को अनावश्यक रूप से दूर धकेल देता है। उन्होंने इशारों में कहा कि बिल पास होने से पहले ही सरकार ने अधिसूचना जारी करके संसदीय परंपराओं को ठेस पहुंचाई है।

साथ ही, दक्षिणी राज्यों के सांसदों ने विशेष चिंता जताई है कि जनसंख्या बढ़ोतरी के आधार पर सीटें बढ़ाने पर उत्तर और पूर्वी राज्यों को भारी प्रतिनिधित्व मिलेगा, जबकि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्य, जिन्होंने दशकों पहले जनसंख्या नियंत्रण लागू किया, उनका राजनीतिक वजन घटेगा। उनका कहना है कि यह संविधान के संघीय संतुलन को कमजोर कर सकता है।

डीएमके सांसद कनिमोझी ने लोकसभा में कहा कि सरकार दक्षिणी राज्यों की उपलब्धियों को सजा दे रही है। उन्होंने कहा कि “हम जनसंख्या नियंत्रण की नीति पर चले, अब हमें कम सीटें देकर दंडित किया जा रहा है।”

सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि पिछले कानून को लागू नहीं किया गया था, इसलिए औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने के लिए नई अधिसूचना जरूरी थी। उन्होंने इसे “कानून का स्वाभाविक विकास” बताया और विपक्ष से इसे राजनीतिक मुद्दा न बनाने की अपील की।

उधर कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने कहा कि पहली बार सभी राजनीतिक दल महिला आरक्षण के समर्थन में एकजुट दिख रहे थे, लेकिन सरकार ने इसे प्रक्रियाओं और तकनीकी शर्तों की भूलभुलैया में डालकर इस सर्वसम्मति को कमजोर कर दिया। उन्होंने कहा कि “महिलाओं का अधिकार तैयार खड़ा है, जरूरत सिर्फ इरादे की है।”

हालाँकि बहस कितनी भी तीखी रही हो, बिल को पारित कराने पर सरकार की मंशा साफ दिख रही है। सदन में बहुमत होने के कारण इसके पारित होने में संदेह कम ही माना जा रहा है, लेकिन विपक्ष का संदेश यह है कि “ऐतिहासिक कदम को ऐतिहासिक देरी में न बदला जाए।”

संसद का माहौल फिलहाल टकरावपूर्ण है, और यह साफ है कि महिला आरक्षण अब सिर्फ समान प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं रह गया—यह भविष्य के राजनीतिक नक्शे, लोकसभा की आकार-प्रकृति और संघीय ढांचे की दिशा तय करने वाला बड़ा विमर्श बन चुका है।

समाचार संकलन: युवराज कुमार (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)

YUVRAJ KUMAR
Author: YUVRAJ KUMAR

प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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