नई दिल्ली, 16 मार्च। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है। मार्च 2026 के मध्य तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका के कारण वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है।इसका सीधा प्रभाव भारतीय मुद्रा पर पड़ा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने ऐतिहासिक निचले स्तर 92.60 रुपये तक गिर गया, जबकि 16 मार्च 2026 की सुबह यह लगभग 92.40 रुपये प्रति डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ रहा है, जिससे चालू खाता घाटा और महंगाई बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
भू-राजनीतिक अनिश्चितता का असर शेयर बाजार पर भी पड़ा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने मार्च के पहले पखवाड़े में ही भारतीय बाजार से लगभग 52,704 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी सक्रिय हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार पिछले सप्ताह केंद्रीय बैंक ने बाजार में लगभग 18 से 20 अरब डॉलर की बिक्री कर रुपये की गिरावट को थामने की कोशिश की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्य-पूर्व में तनाव और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो इसका असर आने वाले दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और ईंधन कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
– यश जयसवाल (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)









