डा. अखिल बंसल
नई शिक्षा नीति, डिजिटल विश्वविद्यालयों और ऑनलाइन डिग्रियों के विस्तार के बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी एक बार फिर बहस के केंद्र में है।

देशभर के विश्वविद्यालय परिसरों और सोशल मीडिया पर उठ रहा विरोध यह संकेत देता है कि असंतोष केवल नीतियों से नहीं, बल्कि व्यवस्था से उपजे भरोसे के संकट से जुड़ा है।
आज यूजीसी के विरोध का प्रमुख कारण नियुक्तियों में देरी और रोस्टर व्यवस्था है। विशेषकर सवर्ण समाज—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग—यह अनुभव कर रहा है कि वर्षों की अकादमिक तैयारी के बावजूद अवसर सीमित होते जा रहे हैं। बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं, अस्थायी नियुक्तियाँ बढ़ रही हैं और चयन प्रक्रियाएँ लंबी होती जा रही हैं। निजी क्षेत्र में रोजगार की अनिश्चितता ने इस असंतोष को और तीखा बना दिया है। यह आज की स्थिति का नग्न सत्य है।
परंतु इसी के साथ एक भ्रम भी तेज़ी से फैलाया जा रहा है—कि यूजीसी अप्रासंगिक हो चुकी है या समाप्त की जा रही है। यह तथ्यात्मक रूप से गलत है। फर्जी विश्वविद्यालयों, अमान्य ऑनलाइन डिग्रियों और शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण के इस दौर में यूजीसी की आवश्यकता पहले से अधिक है। बिना नियमन के उच्च शिक्षा गुणवत्ता के बजाय अराजकता की ओर बढ़ेगी।
यूजीसी आज दो दबावों के बीच खड़ी है। एक ओर योग्यता और अवसर की माँग है, दूसरी ओर सामाजिक न्याय की संवैधानिक बाध्यता। समस्या तब पैदा होती है, जब इन दोनों के बीच संवाद का पुल टूट जाता है। आदेशात्मक निर्देश और अस्पष्ट नियम न केवल शिक्षकों को, बल्कि छात्रों को भी असमंजस में डाल रहे हैं।
आज का सवाल यह नहीं है कि यूजीसी सही है या गलत। असली सवाल यह है कि क्या वह आज की सामाजिक और शैक्षणिक वास्तविकताओं के अनुरूप स्वयं को ढाल पा रही है? विरोध को अनसुना करना उतना ही खतरनाक है, जितना अफ़वाहों के आधार पर संस्था को कटघरे में खड़ा करना।
समाधान टकराव में नहीं, विस्तार में है—नए विश्वविद्यालय, अधिक शैक्षणिक पद, पारदर्शी चयन और समयबद्ध भर्तियाँ। सीमित अवसरों के भीतर न्याय खोजने की कोशिश समाज को और बाँटेगी।
यूजीसी का विरोध तभी सार्थक होगा, जब वह आज की हकीकत से जुड़ा हो। अन्यथा सच और झूठ के बीच भटकता यह विवाद उच्च शिक्षा को ही सबसे बड़ा नुकसान पहुँचा देगा।









