परीक्षा इतनी कठिन भी न हो कि प्रभु के परिणाम से ही मोह समाप्त हो जाए

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जीवन में प्रत्येक मनुष्य की आस्था, श्रद्धा और धैर्य समय-समय पर परीक्षा के दौर से गुजरते हैं। यह प्रकृति का नियम भी है और आध्यात्मिक यात्रा का एक अनिवार्य सत्य भी। जब मनुष्य प्रभु में विश्वास करता है तो वह यह मानकर चलता है कि जो भी परिस्थिति सामने आएगी, उसमें प्रभु की कृपा और न्याय अवश्य छिपा होगा। लेकिन कभी-कभी जीवन ऐसी कठिन परिस्थितियाँ खड़ी कर देता है कि मनुष्य की सहनशीलता की सीमा ही टूटने लगती है। ऐसे समय में मन के भीतर यह प्रश्न उठता है कि क्या यह परीक्षा इतनी लंबी और कठोर होनी चाहिए कि प्रभु के परिणाम पर ही मनुष्य का विश्वास डगमगाने लगे।

आस्था का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य को कभी पीड़ा नहीं होगी। आस्था का अर्थ यह है कि पीड़ा के बीच भी मनुष्य का विश्वास जीवित रहे। परंतु जब दुख, संघर्ष, अपमान, आर्थिक संकट, पारिवारिक विघटन और सामाजिक उपेक्षा एक साथ जीवन पर आक्रमण कर देते हैं, तब मनुष्य भीतर से थक जाता है। वह प्रभु से शिकायत नहीं करता, परन्तु मन ही मन यह अवश्य कह उठता है कि हे प्रभु, परीक्षा तो लीजिए पर इतनी भी न लीजिए कि मनुष्य का मन ही टूट जाए। क्योंकि जब मन टूट जाता है तो व्यक्ति के भीतर की श्रद्धा भी घायल हो जाती है।

धर्मग्रंथों में भी यह बताया गया है कि कर्मों का फल अवश्य मिलता है, और मनुष्य को अपने कर्मों का परिणाम भोगना ही पड़ता है। लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि प्रभु की करुणा और कृपा असीम होती है। जब मनुष्य पूरी निष्ठा, सत्यता और समर्पण के साथ धर्म और सत्य के मार्ग पर चलता है, तब वह यह अपेक्षा भी करता है कि प्रभु उसकी पीड़ा को समझेंगे। वह यह नहीं चाहता कि उसे बिना कारण सुख मिले, बल्कि वह चाहता है कि उसकी सहनशक्ति के अनुरूप ही परीक्षा आए।

कभी-कभी जीवन की कठिनाइयाँ हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। वे हमें अहंकार से मुक्त करती हैं, हमें दूसरों के दुख को समझना सिखाती हैं, और यह भी बताती हैं कि मनुष्य का वास्तविक सहारा केवल प्रभु ही हैं। लेकिन जब संकट इतना अधिक बढ़ जाता है कि मनुष्य के पास आशा का एक भी दीपक नहीं बचता, तब वह भीतर से टूटने लगता है। इसलिए जीवन में संतुलन आवश्यक है—परीक्षा भी हो, पर आशा भी बनी रहे; संघर्ष भी हो, पर विश्वास भी जीवित रहे।

वास्तव में सच्चा भक्त वही है जो कठिन परिस्थितियों में भी प्रभु से विमुख नहीं होता। वह गिरता है, टूटता है, रोता है, लेकिन अंततः प्रभु के चरणों में ही शरण लेता है। फिर भी एक विनम्र प्रार्थना हर भक्त के मन में रहती है—हे प्रभु, मेरी परीक्षा अवश्य लीजिए, पर इतनी कठोर न हो कि आपके परिणाम के प्रति ही मेरा मोह समाप्त हो जाए। क्योंकि यदि मनुष्य का प्रभु से ही विश्वास उठ जाए, तो उसके जीवन का आधार ही समाप्त हो जाता है।

इसलिए जीवन की हर कठिनाई में मनुष्य को धैर्य, विवेक और श्रद्धा को बनाए रखना चाहिए। विश्वास रखना चाहिए कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, प्रभु की कृपा का एक दीपक उसे अवश्य दूर कर सकता है। और जब मनुष्य यह समझ लेता है कि हर परीक्षा अंततः उसे और अधिक मजबूत बनाने के लिए ही आती है, तब उसका मन फिर से विश्वास से भर उठता है।

लेखक – नितिन जैन, पलवल (हरियाणा)

 

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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