प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि “नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखा जाना चाहिए।” न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने कहा कि अदालत का कार्य समाज की नैतिक अपेक्षाओं को लागू करना नहीं, बल्कि नागरिकों के कानूनी अधिकारों की रक्षा करना है।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक वयस्क जोड़ा सहमति से लिव-इन संबंध में रह रहा था, जबकि पुरुष पहले से विवाहित है। महिला के परिजनों ने इस संबंध को अपराध बताते हुए कार्रवाई की मांग की थी।
अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यदि किसी कृत्य में स्पष्ट रूप से कोई आपराधिक प्रावधान लागू नहीं होता, तो केवल सामाजिक या नैतिक आधार पर उसे अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि “सामाजिक विचार और नैतिकता न्यायालय के निर्णय का मार्गदर्शन नहीं करेंगे, यदि कोई कानूनी अपराध स्थापित नहीं होता।”
मामले में राहत देते हुए अदालत ने संबंधित पुलिस प्रशासन को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। साथ ही, शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक को उनकी सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है।
– यश जयसवाल (प्रशिक्षु, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)









