आयरलैंड में जैन समाज का सशक्त विस्तार

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विदेश की धरती पर अपनी पहचान बनाना जितना चुनौतीपूर्ण होता है, उससे कहीं अधिक कठिन होता है अपनी संस्कृति, धर्म और परंपराओं को जीवंत बनाए रखना। यूरोप के सुंदर द्वीपीय देश आयरलैंड में जैन समाज ने इसी चुनौती को अवसर में बदलते हुए अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। संख्या भले ही सीमित हो, लेकिन सामाजिक एकता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक चेतना के कारण आज आयरलैंड का जैन समाज एक सुदृढ़ और प्रेरणादायक समुदाय के रूप में उभर रहा है।

आयरलैंड, जिसकी मूल भाषा आयरिश (गेलिक) है और जहाँ ईसाई धर्म का व्यापक प्रभाव है, वहाँ लगभग पाँच दशक पहले जैन समाज की उपस्थिति का आरंभ हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पंजाब के श्री इंदु सुभाष जैन लगभग 50 वर्ष पूर्व आयरलैंड में बसने वाले प्रथम जैन थे। इसके बाद लगभग 40 वर्ष पूर्व जयपुर मूल के सेना से सेवानिवृत्त डॉ. महेश बज एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती नीरा बज ने आयरलैंड को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। यही वह समय था जब वहाँ जैन समाज के संगठित स्वरूप की नींव रखी गई।

समय के साथ आयरलैंड में सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्सा तथा अन्य पेशेवर क्षेत्रों का विकास हुआ, जिसके कारण भारत से अनेक जैन परिवार वहाँ जाकर बसने लगे। आज आयरलैंड में लगभग 150 जैन परिवारों के करीब 550 सदस्य निवास कर रहे हैं। संख्या भले ही बहुत बड़ी न हो, लेकिन समाज की सक्रियता और संगठन क्षमता उल्लेखनीय है।

डॉ. महेश बज एवं श्रीमती नीरा बज के अथक प्रयासों से जैन समाज को धार्मिक आधार भी मिला। उनके प्रयास एवं सहयोग से आयरलैंड की राजधानी डबलिन में सर्वधर्म हिंदू मंदिर में भगवान महावीर की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई, जहाँ नियमित रूप से धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। नई पीढ़ी को जैन दर्शन एवं संस्कारों से जोड़ने के उद्देश्य से जैन पाठशाला का भी शुभारंभ किया गया, जिससे बच्चों में धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों का संवर्धन हो रहा है।

आयरलैंड का जैन समाज केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता और पारिवारिक आत्मीयता का भी सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। पर्युषण पर्व के दौरान सामूहिक आराधना, घर-घर भजन, प्रवचन तथा क्षमावाणी के अवसर पर सामूहिक मिलन और भोजन का आयोजन समाज की विशेष पहचान बन चुका है। महावीर जयंती और दीपावली जैसे प्रमुख पर्व भी अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। इन अवसरों पर भगवान महावीर के समक्ष लड्डू चढ़ाने की परंपरा तथा सामूहिक पूजा-अर्चना समाज को एक सूत्र में बाँधती है।

समाज का वार्षिक मिलन समारोह विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। किसी सार्वजनिक स्थल पर आयोजित इस कार्यक्रम में “पोटला पार्टी” की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। प्रत्येक परिवार अपने घर से विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर लाता है और सभी मिलकर उनका आनंद लेते हैं। खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और पारिवारिक संवाद इस आयोजन को केवल भोजन तक सीमित नहीं रहने देते, बल्कि यह समाज की आत्मीयता और पारस्परिक सहयोग का उत्सव बन जाता है।

विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि आयरलैंड में दिगंबर, श्वेतांबर और तेरापंथ सहित विभिन्न जैन परंपराओं के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। सभी मिलकर जैन धर्म के सिद्धांतों—अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह और सेवा—को आगे बढ़ाने का कार्य करते हैं। यह समन्वय जैन समाज की सबसे बड़ी शक्ति है और विदेश में उसकी सुदृढ़ पहचान का आधार भी है।

श्रीमती नीरा महेश बज का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने समाज के प्रत्येक परिवार को एक सूत्र में जोड़ने, महिलाओं और बच्चों को सक्रिय भूमिका देने तथा धार्मिक गतिविधियों को निरंतर गति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके समर्पण और सामाजिक नेतृत्व ने आयरलैंड के जैन समाज को नई दिशा और नई पहचान दी है।

आज आयरलैंड में जैन समाज केवल एक प्रवासी समुदाय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और धार्मिक सहिष्णुता का जीवंत प्रतिनिधि बन चुका है। अब समाज की यह स्वाभाविक आकांक्षा है कि भविष्य में आयरलैंड में एक स्वतंत्र एवं भव्य जैन मंदिर की स्थापना हो, जो धार्मिक आस्था के साथ-साथ सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी कार्य करे।

विदेश की धरती पर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का यह प्रेरक प्रयास बताता है कि जहाँ संगठन, संस्कार और समर्पण साथ हों, वहाँ सीमित संख्या भी एक सशक्त पहचान बना सकती है। आयरलैंड का जैन समाज इसी सत्य का सुंदर उदाहरण है।

 

   – अरविंद जैन “बीमा” (स्वतंत्र लेखक, वरिष्ठ व्यंगकार)

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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