कर्मबंध की प्रक्रिया एवं सोशल मीडिया का योगदान

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मनुष्य का जीवन केवल बाह्य घटनाओं का क्रम नहीं, अपितु उसके अंतःकरण में निरंतर चलने वाली भावधारा का प्रतिबिंब है। प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक क्रिया केवल वर्तमान का व्यवहार नहीं होती, बल्कि भविष्य के भाग्य का बीजारोपण भी करती है। जैन दर्शन का कर्म सिद्धांत इसी सनातन सत्य का उद्घोष करता है कि संसार में कोई भी कर्म निष्फल नहीं जाता। प्रत्येक भाव, प्रत्येक प्रतिक्रिया और प्रत्येक मानसिक स्पंदन सूक्ष्म कर्मकणों को आत्मा से जोड़ने का कारण बनता है। वस्तुतः कर्म का बंध बाहरी क्रिया से अधिक भीतरी भावना पर निर्भर करता है। एक ही कार्य दो व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है, किंतु यदि दोनों के भाव भिन्न हैं तो कर्मबंध भी भिन्न होगा। इसलिए जैन आचार्यों ने स्पष्ट कहा है कि कर्म का वास्तविक कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, अपितु राग-द्वेष से युक्त आंतरिक परिणति है।

वर्तमान युग में यदि कर्मबंध की प्रक्रिया का सबसे प्रभावशाली माध्यम खोजा जाए तो निस्संदेह सोशल मीडिया उसका एक अत्यंत शक्तिशाली साधन बन चुका है। यह केवल संचार का माध्यम नहीं रहा, बल्कि विचारों, संस्कारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं का विराट बाज़ार बन गया है। आज मनुष्य का दिन प्रायः मोबाइल स्क्रीन से आरंभ होता है। प्रातःकाल का “सुप्रभात” भी सोशल मीडिया के माध्यम से होता है और रात्रि का “शुभरात्रि” संदेश भी उसी पर समाप्त होता है। दिनभर हमारी आँखें जिन दृश्यों को देखती हैं, कान जिन ध्वनियों को ग्रहण करते हैं और मन जिन विचारों को स्वीकार करता है, वे सब हमारी चेतना का अंग बनते जाते हैं। यही चेतना आगे चलकर हमारे कर्मबंध का आधार बनती है।

मनुष्य सामान्यतः यह समझता है कि केवल प्रत्यक्ष हिंसा, चोरी, असत्य या अनैतिक कार्य ही कर्मबंध के कारण हैं, जबकि जैन दर्शन इससे कहीं अधिक सूक्ष्म दृष्टि प्रस्तुत करता है। किसी हिंसक विचार का समर्थन करना, किसी अपमानजनक टिप्पणी पर प्रसन्न होना, किसी द्वेषपूर्ण पोस्ट को प्रोत्साहित करना अथवा किसी असत्य प्रचार को आगे बढ़ाना भी भावात्मक स्तर पर उसी कर्म का सहभागी बनना है। सोशल मीडिया पर किया गया प्रत्येक ‘लाइक’, प्रत्येक ‘कमेंट’, प्रत्येक ‘शेयर’ और प्रत्येक ‘पोस्ट’ केवल तकनीकी क्रिया नहीं है; वह हमारी अंतरंग स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का उद्घोष है। जहाँ हमारी स्वीकृति जुड़ती है, वहीं हमारा भाव जुड़ता है, और जहाँ भाव जुड़ता है, वहीं कर्मबंध की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।

आज डिजिटल संसार में राग और द्वेष का व्यापार अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया है। उत्तेजना, कटुता, वैमनस्य, अपमान, व्यंग्य, असत्य, अफवाह, सांप्रदायिक विद्वेष, सामाजिक विभाजन और चरित्र-हनन जैसे अनेक प्रकार के विषय अत्यधिक आकर्षण के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं। दुर्भाग्य यह है कि लोग उन्हें केवल देखते ही नहीं, बल्कि उन्हें पसंद करते हैं, साझा करते हैं और आगे प्रसारित भी करते हैं। उन्हें यह आभास भी नहीं होता कि वे केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं कर रहे, बल्कि अपने अंतःकरण को उसी प्रकार के भावों से संस्कारित कर रहे हैं। राग को स्वीकार करना राग का बीज बोना है और द्वेष का समर्थन करना द्वेष के कर्मों को पुष्ट करना है। यही कारण है कि सोशल मीडिया आज अनजाने में कर्मबंध का एक अत्यंत प्रभावशाली माध्यम बन गया है।

कर्म का सिद्धांत केवल व्यक्तिगत उत्तरदायित्व तक सीमित नहीं है; उसमें प्रेरणा, अनुमोदना और सहयोग भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण माने गए हैं। यदि हम किसी अशुभ विचार का समर्थन करते हैं, किसी हिंसक मानसिकता को प्रोत्साहित करते हैं अथवा किसी वैमनस्यपूर्ण अभियान का अंग बनते हैं, तो उस दुष्प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाले व्यापक परिणामों में हमारी भी भावात्मक सहभागिता जुड़ जाती है। जिस प्रकार एक छोटी-सी चिनगारी विशाल वन को अग्नि में परिवर्तित कर सकती है, उसी प्रकार एक असावधान ‘शेयर’ अथवा एक उग्र टिप्पणी हजारों मनों में द्वेष की ज्वाला प्रज्वलित कर सकती है। इसलिए डिजिटल माध्यमों पर हमारी सक्रियता केवल सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्तरदायित्व भी है।

इसके विपरीत यदि हम अहिंसा, करुणा, क्षमा, समता, सद्भाव, वीतरागता, आत्मचिंतन, सदुपदेश, नैतिकता और मानवीय मूल्यों से युक्त सामग्री को प्रोत्साहित करते हैं, उसे साझा करते हैं और उसके समर्थन में अपने सकारात्मक विचार व्यक्त करते हैं, तो न केवल समाज में सद्भावना का विस्तार होता है, बल्कि हमारे अंतःकरण में भी शुभ भावों का विकास होता है। जब हमारे माध्यम से हजारों व्यक्तियों तक प्रेरणा, प्रेम और सदाचार का संदेश पहुँचता है, तब वह केवल सामाजिक सेवा नहीं रहती; वह पुण्य कर्मों के संचय का भी कारण बनती है। शुभ भावों का प्रसार आत्मा के लिए उतना ही पवित्र है जितना दीपक का प्रकाश अंधकार के लिए।

सोशल मीडिया वस्तुतः दर्पण नहीं, आवर्धक है। वह हमारे भीतर जो है, उसी को अनेक गुना बढ़ाकर संसार के सम्मुख प्रस्तुत कर देता है। यदि भीतर ईर्ष्या है तो वही फैलती है; यदि भीतर करुणा है तो वही प्रसारित होती है। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि सोशल मीडिया कैसा है; प्रश्न यह है कि उसका उपयोग करने वाला हमारा अंतःकरण कैसा है। उपकरण कभी शुभ या अशुभ नहीं होते, उन्हें दिशा देने वाले भाव शुभ या अशुभ होते हैं।

आज आवश्यकता डिजिटल संयम की है। जिस प्रकार जैन साधना में आहार संयम, वाणी संयम और इंद्रिय संयम का महत्त्व बताया गया है, उसी प्रकार वर्तमान समय में ‘डिजिटल संयम’ भी एक आध्यात्मिक साधना बन गया है। देखने से पहले विवेक, लिखने से पहले विचार, टिप्पणी करने से पहले संवेदना और साझा करने से पहले सत्य की कसौटी—यदि ये चार सूत्र हमारे जीवन का अंग बन जाएँ, तो सोशल मीडिया कर्मबंध का कारण न बनकर आत्मकल्याण का साधन बन सकता है।

वस्तुतः संसार में प्रत्येक क्षण हम अपने भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। हमारी उँगलियाँ केवल स्क्रीन को स्पर्श नहीं करतीं, वे हमारी आत्मा के भविष्य का भी स्पर्श करती हैं। प्रत्येक क्लिक एक संस्कार है, प्रत्येक टिप्पणी एक भाव है और प्रत्येक साझा किया गया विचार कर्म के बीज बोने का माध्यम है। इसलिए विवेकपूर्ण डिजिटल आचरण ही आधुनिक युग का आध्यात्मिक व्रत है।

अंततः स्मरण रखना चाहिए कि कर्मों का लेखा किसी यंत्र में नहीं, आत्मा में अंकित होता है। सोशल मीडिया पर लिखे गए शब्द मिटाए जा सकते हैं, पोस्ट हटाई जा सकती है, टिप्पणियाँ संपादित की जा सकती हैं; किंतु उन सबके पीछे उत्पन्न हुए भावों से बँधे कर्म तब तक नहीं मिटते जब तक आत्मा सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के आलोक में स्वयं को निर्मल न बना ले। अतः आइए, हम अपने डिजिटल व्यवहार को भी आध्यात्मिक अनुशासन का अंग बनाएँ, ताकि हमारी प्रत्येक अभिव्यक्ति राग-द्वेष की नहीं, बल्कि अहिंसा, करुणा, समता और वीतरागता की वाहक बने। यही आधुनिक युग में कर्म सिद्धांत की सच्ची साधना है और यही आत्मकल्याण की वास्तविक दिशा।

   -सुनील सुधाकर शास्त्री

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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