अत्यधिक सुविधा भोगी जीवन खत्म कर रहा है संतति का सामर्थ्य

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मनुष्य ने सभ्यता की यात्रा संघर्ष से प्रारम्भ की थी। कभी वह नंगे पाँव तपती धरती पर मीलों चलता था, नदियों को पार करता था, लकड़ियाँ काटता था, कुएँ से पानी खींचता था और अपने श्रम से जीवन की गरिमा अर्जित करता था। आज वही मनुष्य सुविधाओं के ऐसे मायाजाल में कैद हो चुका है, जहाँ श्रम बोझ प्रतीत होता है और आराम जीवन का परम लक्ष्य। विडम्बना यह है कि जिस सुविधा को हमने सुख का पर्याय समझ लिया, वही धीरे-धीरे हमारी संतति के सामर्थ्य का क्षरण कर रही है।

आज का युग यंत्रों का युग है। मशीनों ने मनुष्य के हाथों का श्रम छीन लिया है और कृत्रिम सुविधाओं ने शरीर की सहनशीलता। परिणामस्वरूप हमारी नई पीढ़ी बाह्य रूप से भले ही आधुनिक दिखाई देती हो, किन्तु भीतर से वह दुर्बल, असहिष्णु और समर्थहीन होती जा रही है। जिस बाल्यावस्था में बच्चों की आँखों में चमक, पैरों में फुर्ती और मन में जिजीविषा होनी चाहिए थी, उसी अवस्था में आज चश्मा, एलर्जी, मोटापा, थकान और मानसिक तनाव सामान्य बात बनते जा रहे हैं। जन्म के कुछ वर्षों बाद ही बच्चों की आँखों पर मोटे लेंस चढ़ जाना अब किसी को चौंकाता नहीं। सुनने की क्षमता, देखने की क्षमता और कार्य करने की क्षमता निरन्तर प्रभावित हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति धीरे-धीरे मनुष्य की इन्द्रियों से उसका स्वाभाविक सामर्थ्य वापस ले रही हो।

यह अत्यंत चिंताजनक है कि हमारी संतति का संबंध अब प्रकृति से नहीं, मशीनों से अधिक हो गया है। बच्चे मिट्टी में खेलना भूल गए हैं; उन्हें वृक्षों की छाया से अधिक मोबाइल की स्क्रीन प्रिय लगती है। गणित की छोटी-छोटी गणनाएँ, जो कभी उँगलियों और मस्तिष्क के अभ्यास से सहज हो जाया करती थीं, अब कैलकुलेटर और मोबाइल के बिना असंभव प्रतीत होती हैं। जोड़ना, घटाना, भाग करना जैसी मूलभूत मानसिक क्षमताएँ भी क्षीण हो रही हैं। स्मरण शक्ति का स्थान ‘सर्च इंजन’ ने ले लिया है और बुद्धि का स्थान कृत्रिम उपकरणों ने।

बच्चों का शरीर भी अब छुईमुई के पौधे की भाँति अत्यंत सुकुमार होता जा रहा है। थोड़ी सी धूप, थोड़ी सी वर्षा, थोड़ी सी ठंड या थोड़ी सी थकान उन्हें रोगग्रस्त कर देती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता में जो अद्भुत सामर्थ्य कभी ग्रामीण जीवन और श्रमशील संस्कृति में दिखाई देता था, वह आज विलुप्त होता जा रहा है। इसका कारण स्पष्ट है—हमने अपने बच्चों को संघर्ष से दूर रखा, उन्हें हर असुविधा से बचाया और अनजाने में उन्हें जीवन के वास्तविक ताप से अपरिचित बना दिया।

आज माता-पिता स्वयं भी सुविधा-भोगी जीवन के अभ्यस्त हो चुके हैं। घर के बाहर निकलने के लिए वाहन चाहिए, थोड़ी दूरी तय करने के लिए भी मोटरसाइकिल या कार चाहिए। पैदल चलना मानो पिछड़ेपन का प्रतीक बन गया है। कभी लोग एक गाँव से दूसरे गाँव तक पैदल यात्राएँ करते थे; उन यात्राओं में केवल दूरी ही नहीं नापी जाती थी, बल्कि शरीर की क्षमता, मन की सहनशीलता और आत्मबल भी विकसित होता था। अब निकटतम बाजार तक भी बिना वाहन के जाना कठिन लगता है। परिणामस्वरूप शरीर निष्क्रिय हो रहा है और मन आलसी।

मशीनीकरण ने जीवन को जितना सरल बनाया है, उतना ही निर्बल भी। कपड़े धोने की मशीन, आटा पीसने की मशीन, सफाई के उपकरण, लिफ्ट, एस्केलेटर और अनगिनत स्वचालित साधनों ने मनुष्य के श्रम को लगभग समाप्त कर दिया है। कभी घर की स्त्रियाँ हाथ से चक्की चलाती थीं, नदी या कुएँ से पानी भरती थीं, हाथ से कपड़े धोती थीं; यह केवल कार्य नहीं था, बल्कि शरीर को सक्रिय और स्वस्थ रखने का सहज माध्यम भी था। आज मशीनें सब कर रही हैं और मनुष्य केवल बटन दबाने तक सीमित रह गया है। यह सुविधा धीरे-धीरे स्वावलम्बन को निगल रही है।

शारीरिक दुर्बलता के साथ-साथ बौद्धिक समर्थता भी घट रही है। अत्यधिक आराम ने मनुष्य की जिजीविषा को कुंठित कर दिया है। बच्चे समस्याओं का समाधान स्वयं खोजने के बजाय तुरंत तकनीक का सहारा लेते हैं। धैर्य समाप्त हो रहा है, सहनशीलता समाप्त हो रही है और मानसिक दृढ़ता भी कम होती जा रही है। छोटी-छोटी असफलताएँ युवाओं को अवसाद की ओर धकेल रही हैं। यह स्थिति केवल सामाजिक नहीं, बल्कि सभ्यता के भविष्य के लिए भी गंभीर संकट है।

सबसे भयावह तथ्य यह है कि युवा अवस्था में ही हृदयाघात, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और ‘साइलेंट अटैक’ जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। दस-पंद्रह और पच्चीस वर्ष के युवा भी अचानक मृत्यु का शिकार हो रहे हैं। यह केवल चिकित्सा विज्ञान की समस्या नहीं, बल्कि हमारी जीवन शैली का दुष्परिणाम है। शरीर श्रम चाहता है, गति चाहता है, संघर्ष चाहता है; परन्तु हमने उसे कुर्सियों, वातानुकूलित कमरों और कृत्रिम सुखों की कैद में बंद कर दिया है।

प्रकृति का नियम अत्यंत स्पष्ट है—जो अंग जितना प्रयुक्त होगा, उतना ही सक्षम रहेगा। यदि मनुष्य चलना छोड़ देगा तो उसके पाँव दुर्बल हो जाएँगे; यदि वह सोचना छोड़ देगा तो उसकी बुद्धि कुंठित हो जाएगी; यदि वह संघर्ष से भागेगा तो उसका आत्मबल नष्ट हो जाएगा। आज हमारी संतति इसी संकट से गुजर रही है। हम उन्हें सुविधा तो दे रहे हैं, पर सामर्थ्य नहीं; साधन तो दे रहे हैं, पर साहस नहीं; सुख तो दे रहे हैं, पर संघर्ष करने की क्षमता नहीं।

समय की माँग है कि हम पुनः श्रम की संस्कृति की ओर लौटें। बच्चों को प्रकृति के निकट ले जाएँ, उन्हें पैदल चलना सिखाएँ, मिट्टी में खेलने दें, छोटे-छोटे कार्य स्वयं करने दें। उन्हें हर क्षण सुविधा उपलब्ध कराने के बजाय कठिनाइयों का सामना करना भी सिखाएँ। घरों में श्रम का सम्मान पुनः स्थापित करना होगा। शरीर को श्रम और मन को अनुशासन की आवश्यकता है।

यदि आने वाली पीढ़ियों को सचमुच समर्थ, स्वस्थ और साहसी बनाना है, तो हमें सुविधा और विलासिता की अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब मनुष्य के पास सभी सुविधाएँ होंगी, पर उन्हें उपयोग करने का सामर्थ्य नहीं बचेगा। सभ्यता का वास्तविक वैभव आराम में नहीं, बल्कि उस शक्ति में है जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहने का साहस दे। आज आवश्यकता इसी साहस को पुनर्जीवित करने ~की~ है।

भोग वा आराम कासुख क्षणिक दुख की खान है,

योग से साम्प्रिक्त जीवन में, सदा उत्थान है।

देह को आराम दोगे, देह तुमको त्रास देगी,

आत्महित के योग में ही, देह का सम्मान है।।

– सुनील सुधाकर शास्त्री

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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