मानव सभ्यता के उषाकाल में जब युग परिवर्तन की बेला थी और ‘कल्पवृक्षों’ की व्यवस्था समाप्त हो रही थी, तब मरुदेवी के गर्भ और नाभिराय के कुल में एक ऐसी चेतना ने जन्म लिया जिसने संसार को ‘असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प’ का प्रथम पाठ पढ़ाकर कर्म-युग का सूत्रपात किया। दिगंबर जैन आगमों के अनुसार, भगवान ऋषभदेव ही इस युग के प्रथम तीर्थंकर, प्रथम चक्रवर्ती और प्रथम दिगंबर मुनि थे, जिन्होंने मोह-रूपी अंधकार को नष्ट कर मोक्ष मार्ग प्रवर्तित किया। उनकी ऐतिहासिकता केवल जैन ग्रंथों तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रीमद्भागवत पुराण के पांचवें स्कंध में उन्हें विष्णु के आठवें अवतार के रूप में औऋषभदेवर ऋग्वेद के प्राचीन मंत्रों में ‘ऋषभो’ नाम से गौरव प्राप्त है। डॉ. एस. राधाकृष्णन और जर्मन विद्वान डॉ. हर्मन जैकोबी जैसे विचारकों ने भी उनके दर्शन को वेदों से प्राचीन और स्वतंत्र विचारधारा माना है। आदिनाथ द्वारा प्रतिपादित ‘अहिंसा, संयम और तप’ का मूल मंत्र आज के परमाणु युद्ध और वैचारिक टकराव के युग में ‘अनेकांतवाद’ (वैश्विक कूटनीति का आधार) और ‘अपरिग्रह’ (पर्यावरण संरक्षण का मॉडल) बनकर उभरा है। वर्तमान में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी, गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी और राष्ट्रसंत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की परंपरा के साधु-साध्वियों ने अपनी चर्या और ‘मूकमाटी’ जैसे कालजयी साहित्य के माध्यम से ऋषभदेव के सिद्धांतों को वैज्ञानिक धरातल पर पुनर्स्थापित किया है। कैलाश पर्वत (अष्टापद) से निर्वाण प्राप्त करने वाले आदिपुरुष का ‘जीओ और जीने दो’ का संदेश आज की युवा पीढ़ी के लिए ‘एथिकल लिविंग’ और ‘वीगनिज्म’ जैसी आधुनिक अवधारणाओं का मूल स्रोत है।
निष्कर्ष: भगवान ऋषभदेव का जीवन संदेश केवल प्राचीन धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी के पर्यावरणीय और मानवीय संकटों का शाश्वत समाधान है। आज के यांत्रिक युग में जब मनुष्य स्वयं मशीन बनने की ओर अग्रसर है, तब आदिनाथ की करुणा और दिगंबर मुनियों की अकिंचनता ही हमें पुनः ‘संवेदनशील मानव’ बना सकती है। उन्हें केवल मंदिर की मूर्तियों में नहीं, बल्कि अपने उस आचरण में खोजना होगा जहाँ हम प्रकृति का सम्मान करें और ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम’ (जीव एक-दूसरे के उपकारक हैं) के वैश्विक भाव को आत्मसात करें।
— मयंक जैन, मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़









