होलिका दहन के बाद अब माहौल पूरी तरह रंगों के इस खुशनुमा त्योहार के स्वागत में तैयार है। होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि ऐसा मौका है जो रिश्तों में जमी धूल साफ कर देता है, मन के बोझ हल्के कर देता है और लोगों को फिर से एक-दूसरे के करीब ले आता है।
आज जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है, लोग स्क्रीन पर तो करीब हैं लेकिन दिलों में दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में होली जैसे त्योहार हमें याद दिलाते हैं कि इंसानियत की असली पहचान आपसी मेलजोल और सौहार्द में है। यह वही दिन है जब लोग बीते मनमुटाव भूलकर हाथ बढ़ाते हैं, रंग लगाकर मुस्कुरा देते हैं और दिलों के दरवाज़े खोल देते हैं।
होली की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह हर उम्र, हर वर्ग और हर पृष्ठभूमि के लोगों को एक ही मंच पर खड़ा कर देती है। मोहल्लों में सुबह से ही ढोलक की थाप, बच्चों की रंगबिरंगी टोली, युवाओं का जोश और बड़े-बुज़ुर्गों की दुआएँ—सब मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं जो सालभर याद रहता है।
रंगों की यही खासियत है कि वे भेदभाव नहीं करते। रंग लगने के बाद न कोई बड़ा दिखता है, न छोटा; न कोई अमीर, न गरीब; न किसी का धर्म अलग दिखता है, न जाति। रंग एक पल में इंसान को इंसान से जोड़ देते हैं—और शायद यही इस त्योहार की सबसे सुंदर सीख है।
मिलन समारोहों में जब लोग एक-दूसरे के घर पहुँचते हैं, परंपरागत मिठाइयाँ बाँटते हैं, ठंडाई के साथ हंसी ठिठोली होती है, तो महसूस होता है कि ज़िंदगी की भागदौड़ भले बढ़ गई हो, लेकिन रिश्तों की गर्माहट अभी भी ज़िंदा है। किसी ने सही कहा है—रिश्ते तभी जिन्दा रहते हैं जब उन्हें निभाया जाए, और होली हमें निभाने का मौका देती है।
रंगों में भीगी मुस्कानें, चेहरों पर गुलाल की नरम परत, कंधे पर हाथ रखकर कहा गया “चलो, सब भूलते हैं”—यह सब मिलकर होली को केवल त्योहार नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अनुभव बना देते हैं।
यह त्योहार हमें सिखाता है कि जीवन की असली खूबसूरती हमारे रिश्तों और मेल-मिलाप में छिपी है। रंगों की तरह ही हमें अपने मन में भी उजाला भरना चाहिए—नफ़रतों से दूर, प्रेम और अपनापन के साथ।
अंत में यही कहा जा सकता है कि होली सिर्फ रंग उड़ाने का दिन नहीं, बल्कि रिश्तों को फिर से रंगने का दिन है। दुनिया चाहे जितनी भी बदल जाए, रंग, प्रेम और भाईचारा—ये तीनों आज भी उतने ही ज़रूरी हैं जितने सदियों पहले थे।
और शायद इसी वजह से होली हर बार हमें नई उम्मीद, नया उत्साह और नई ऊर्जा दे जाती है।
– युवराज कुमार (प्रशिक्षु मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)









