तप,त्याग और साधना के आदर्श थे : सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य

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भारतीय इतिहास में सत्ता , नीति और आध्यात्मिकता का समन्वित व्यक्तित्व यदि किसी में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है तो  वह है चंद्रगुप्त मौर्य । उनका व्यक्तित्व राजनीतिक संगठन साम्राज्य निर्माण और आध्यात्मिक उत्कर्ष तीनों आयामों में अद्वितीय है। वे मौर्य साम्राज्य के संस्थापक थे जिन्होंने पहली बार भारत के विशाल भू भाग को एक शासन सूत्र में पिरोया। किंतु उनका जीवन केवल साम्राज्य विस्तार तक सीमित नहीं रहा ; जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने जैन धर्म स्वीकार कर तप, त्याग और आत्म संयम का आदर्श स्थापित किया।
      चंद्रगुप्त मौर्य का उदय चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में हुआ। उनके मार्गदर्शक चाणक्य ने उन्हें नंद वंश के विरुद्ध संगठित किया । लगभग 322 ईसा पूर्व में उन्होंने मगध की सत्ता प्राप्त की और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। उनका शासन काल 298 ईसा पूर्व तक  लगभग 24 वर्ष का माना जाता है। उनके शासनकाल में प्रशासनिक संगठन, आर्थिक व्यवस्था और सामरिक शक्ति का अभूतपूर्व विकास हुआ। यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर से संधि और व्यापक प्रशासनिक सुधारों ने उन्हें प्रथम  अखिल भारतीय सम्राट के रूप में प्रतिष्ठापित किया। उनका शासनकाल भारतीय इतिहास में स्वर्णिम युग कहलाता है। उन्होंने भारत को राजनीतिक दृष्टि से एक सूत्र में बांधा।उनका राज्य विंध्याचल सीमा से भी आगे तक विस्तृत था।
    एक दिन सम्राट  चंद्रगुप्त ने 16 स्वप्न देखे। उन स्वप्नों ने उन्हें आकुल-व्याकुल कर दिया। जैन परंपरा के अनुसार आचार्य भद्रबाहु से चंद्रगुप्त ने स्वप्नों का फल जानना चाहा। निमित्त ज्ञानी आचार्य भद्रबाहु ने  स्वप्नों की विशद व्याख्या करते हुए फलादेश को अनिष्ट  सूचक बताया तथा मगध में बारह वर्ष के भयंकर अकाल की भविष्यवाणी की। इस संकट से बचने हेतु वे अपने शिष्यों सहित दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान कर गये। चंद्रगुप्त जो उस समय सम्राट के पद पर आसीन थे संसार की असारता देख उन्हें वैराग्य हो गया और वे अपने पुत्र बिन्दुसार को शासन की बागडोर सोंप वैराग्य पथ की ओर निकल पड़े। उन्होंने आचार्य भद्रबाहु से जिन दीक्षा ले ली और उनके साथ दक्षिण की ओर विहार कर लिया।
     चंद्रगुप्त का धर्म परिवर्तन आकस्मिक नहीं अपितु दार्शनिक और आध्यात्मिक प्रेरणा से प्रेरित था। इतना विशाल राजपाट त्यागकर दिगम्बर जैन मुनि की कठोर चर्या अपनाना भारतीय इतिहास की अद्वितीय घटना थी जो अकल्पनीय है। चंद्रगुप्त ने सांसारिक वैभव का परित्याग कर संयम, अपरिग्रह और तप का मार्ग चुना। उनका यह कदम नर से नारायण बनने की दिशा में पहला कदम था। यह घटना केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं अपितु वैराग्य और आत्मबोध की ओर निर्णायक कदम था। तिलोएपण्णत्ति ग्रंथ के अनुसार दीक्षा लेने वाले चंद्रगुप्त मुकटबद्ध राजाओं में अंतिम सम्राट थे।
चंद्रगुप्त मौर्य अब सम्राट नहीं अपितु विशाखाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। चंद्रगुप्त का त्याग भारतीय चिंतन में यह सिद्ध करता है कि धर्म और राजनीति परस्पर विरोधी नहीं अपितु नैतिक अनुशासन द्वारा परस्पर पूरक हो सकते हैं। उनकी जिन दीक्षा ने यह संदेश दिया कि वास्तविक विजय आत्मविजय है।
  आचार्य भद्रबाहु चंद्रगुप्त सहित अपने 12 हजार शिष्यों का विशाल संघ लेकर दक्षिण भारत के पुन्नाट देश में चले गये जिससे जिन शासन की दिगम्बरत्व की परम्परा यथावत चलती रहे। प्राकृतिक संकेतों के आधार पर भद्रबाहु को अपना अंतिम समय सन्निकट प्रतीत हुआ अतः कर्नाटक के श्रवणबेलगोला क्षेत्र को  अपने अंतिम समय के लिए चुना। वे वहां तपस्या और साधना में लीन हो गये। भद्रवाहु आचार्य ने अपना अंतिम समय जानकर संघ को राग न हो अतः  संघ को अन्यत्र विहार करने का आदेश देकर विदा कर दिया परन्तु विशाखाचार्य ने ऐसी अवस्था में गुरु को अकेला छोड़ना उचित नहीं समझा अतः उनकी सेवा के लिए वहीं रुक गये।
    जिस पर्वत पर भद्रबाहु ने अंतिम सांस ली वह बाद में चंद्रगुप्त वसदि नाम से विख्यात हुआ । अभी उस पर्वत को चंद्रगिरि नाम से भी जाना जाता है।पर्वत पर आचार्य भद्रवाहु एवं विशाखाचार्य के चरण विद्धमान हैं।
     दक्षिण भारत में जैन-धर्म के प्रचार-प्रसार का एक महत्वपूर्ण चरण था। चंद्रगुप्त के प्रभाव से हजारों की संख्या में लोग जैन सिद्धान्तों की ओर आकर्षित हुए और अहिंसा, अपरिग्रह तथा सत्य को अपनाकर जैन बन गये।
    जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्त जो अब विशाखाचार्य हो गये थे उन्होंने भी कठोर तप का अनुसरण किया और सल्लेखना व्रत धारण कर आत्म साधना रत रहकर शरीर का परित्याग किया।
 जैन-धर्म के विस्तार में चंद्रगुप्त मौर्य के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उनके कारण राजकीय संरक्षण होने से जैन परंपरा को प्रतिष्ठा मिली। उत्तर और दक्षिण भारत के धार्मिक सेतु का निर्माण हुआ। उन्होंने तप, त्याग और आत्मसंयम का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया।
भारतीय इतिहास में अनेक विजेता हुए परंतु आत्मविजेता विरले ही हुए हैं। चंद्रगुप्त मौर्य ने राज वैभव त्यागकर जैन मुनि जीवन की कठोर साधना को अपनाया। यह घटना केवल धार्मिक प्रसंग नहीं अपितु भारतीय संस्कृति में सत्ता से साधना की ऐतिहासिक यात्रा का प्रतीक है।
     आज जब समाज भौतिक उपलब्धियां को सफलता का मानदंड मानता है तब चंद्रगुप्त का जीवन हमें स्मरण कराता है की सच्ची विजय आत्म विजय है। सत्ता, संपत्ति और प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचकर उनका वैराग्य यह सिद्ध करता है कि मूल्यहीन शक्ति स्थाई नहीं होती; संयम और सत्य ही चिरस्थाई हैं। चंद्रगिरि पर्वत पर उत्कीर्ण अनेक शिलालेख आज चंद्रगुप्त की यशोगाथा बताने विद्धमान हैं।यही नहीं चंद्रगुप्त वसदि की दीवारों पर उत्कीर्ण उनका सम्पूर्ण जीवनदर्शन बताने वाला मूक शिल्प उनके विराट व्यक्तित्व को अजय अमर बनाता है।
समाचार संकलन: युवराज कुमार (प्रशिक्षु मंगलायतन विश्वविद्यालय, अलीगढ़)
        डॉ. अखिल बंसल
*संपादक समन्वय वाणी*
129 जादौन नगर-बी, स्टेशन रोड
दुर्गापुरा, जयपुर -302018
Samanvay Vani
Author: Samanvay Vani

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