डा.अखिल बंसल
हिंदी साहित्य जगत में कविवर बनारसीदास एक जाने-माने व्यक्तित्व हैं उनके *अर्ध कथानक* को हिंदी का आद्य आत्मकथा साहित्य कहलाने का गौरव प्राप्त है। उनके द्वारा रचित *समयसार नाटक* अध्यात्म प्रेमी जगत के कंठ का हार लगभग 400 वर्ष से बना हुआ है । 12 फरवरी को उनका 439 वां जन्मदिवस है । उनका

जन्म माघ सुदी 11 रविवार संवत् 1643 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर में श्वेतांबर संप्रदाय में हुआ था । इनके पिता खरगसेन जी जौनपुर के नामी जोहरी थे। कविवर बनारसीदास जी ने अपने जीवन के 55 वर्षों का घटना प्रधान इतिहास अपनी आत्मकथा *अर्द्ध कथानक* में बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है । आपने जिस अध्यात्म शैली का प्रतिपादन किया वह 13 पंथ के नाम से विशाल वट वृक्ष के रूप में फला फूला। आपने सम्राट अकबर का अंतिम समय, जहांगीर का शासनकाल तथा शाहजहां के शासन का प्रारंभ बहुत ही निकट से देखा है और उसका सजीव चित्रण अपने अर्द्ध कथानक में किया है। कविवर का संपूर्ण जीवन मौत ,बीमारी, अभाव, संघर्ष तथा कड़वे मीठे अनुभव से परिपूर्ण था। बनारसीदास आशिकी में कई बार मिटे बने । यहां तक कि सं.1657 में जब उनकी आयु मात्र 14 वर्ष की थी विदग्ध श्रृंगार रस पर एक नवरस ग्रंथ ही रच डाला किंतु जब निर्वेद का अलग जगा तो गोमती की धारा में उस उत्कृष्ट रचना को प्रवाहित कर दिया ।
” पोथी एक बनाई नई,मित हजार दोहा चौपई।
तामै नवरस रचना लिखी,पै विशेष बरनन आसिखी।
ऐसे कुकवि बनारसी भये,मिथ्या ग्रंथ बनाए नये।।”
व्यापार के सिलसिले में उनके जीवन का अधिकांश समय उत्तर प्रदेश के जौनपुर व आगरा में बीता । उस समय की राजनीतिक व सामाजिक स्थिति तथा व्यापारियों की कठिनाइयों का बेलौस वर्णन उनकी आत्मकथा में सन्निहित है।एक के बाद एक रोचक घटनाओं से उनका जीवन भरा हुआ था।
समयसार पढ़ने के उपरांत दिगंबर जैन धर्म में उनकी अगाध एवं सच्ची श्रद्धा रही। सन् 1636 में उन्होंने समयसार नाटक की हिंदी में पद्य रचना की । उनकी प्रसिद्धि के लिए यही ग्रंथ काफी है । आपकी फुटकर रचनाओं का संकलन *बनारसी विलास* में संग्रहित है। एक बार बनारसीदास जी की काव्य प्रशंसा सुनकर तुलसीदास जी ने उनसे मिलने अपने चेलों के साथ आगरा आए। कविवर से मिलकर वह हर्षित हुए बिना नहीं रहे। जाते समय उन्होंने अपनी कृति *रामायण* बनारसी दास जी को भेंट की। जब तुलसीदास जी ने उनका अभिप्राय जानना चाहा तो कविवर ने तत्काल काव्य रचकर सुनाया।
उन्होंने लिखा-
विराजे रामायण घट माहिं
मरमी होय मरम सो जानें, मूरख मानै नाहीं।।
आतमराम ज्ञान गुन लक्षमन,सीता सुमति सुमेत।
शुभोपयोग वानर दल मण्डित,वर विवेक रण खेत…..
बनारसी दास जी की इस आध्यात्मिक रचना से तुलसीदास जी ने प्रसन्न होकर पारसनाथ स्तोत्र बनाया और भक्ति विरुदावली नामक उस रचना को कविवर को भेंट की।
कविता के बोल इस प्रकार थे-
जिहि नाथ पारस जुगल पंकज चित्त चरनन जास ।
रिद्धि सिद्धि कमला अजर राजति भजत तुलसीदास।
जैन धर्म के प्रति पूर्ण श्रद्धा जागृत होने पर आपके हृदय में अंध श्रद्धा का किंचित भी स्थान नहीं रहा। बे जब तक परीक्षा नहीं कर लेते किसी पर विश्वास नहीं करते ।एक बार आगरा में बाबा शीतल दास जी पधारे उनके शांति प्रियता और क्षमा की चर्चाएं चारों ओर फैल गई ।जब बनारसी दास जी ने उनके विषय में सुना तो वे भी उनका उपदेश सुनने पहुंच गए और सभा में एक कोने में जाकर बैठ गये। सभा की समाप्ति पर कविवर ने पूछा आपका नाम क्या है? बाबा जी ने कहा मुझे शीतल दास कहते हैं। कुछ देर बातचीत करने के उपरांत कविवर ने कहा कृपा निधान मैं आपका नाम भूल गया ; उत्तर मिला शीतलदास। एक-दो बातें करने के उपरांत कविवर फिर पूछ बैठे -महाशय क्षमा कीजिए मैं फिर भूल गया आपका नाम और ऐसा अनेक बार पूछने पर बाबा गुस्से में फूट गए और झुंझलाकर बोले बेवकूफ 10 बार तो बता दिया शीतलदास और कितनी बार पूछोगे । बस अब क्या था परीक्षा हो चुकी थी । कविवर बोले बाबा आपका नाम तो ज्वाला प्रसाद होने योग्य है।
कविवर मित्रों के सदा स्नेह पात्र रहे नरोत्तमदास से उनकी गहरी मित्रता थी दोनों एक दूसरे के बिना रह नहीं पाते थे। संपत्ति विपत्ति कैसा भी समझ रहा हो इस मित्र ने सदा मित्रता का निर्वहन किया। अपने मित्र के असामयिक निधन को कविवर कभी नहीं भुला सके । उसके परलोक गमन से बनारसी दास जी को गहरा आघात लगा ।
जौनपुर का नवाब चीनी किलीच खां आपका बहुत सम्मान करता था। बादशाह की ओर से उसे “चार हजारी मीर” का खिताब हासिल था। जब किलीच खां जौनपुर का नवाब बनकर आया तब उसने कविवर की ख्याति की चर्चा सुनी तभी उसने कविवर को अपने पास बुला भेजा। धीरे-धीरे दोनों में प्रगाढ़ मित्रता हो गई। उसने कविवर से नाममाला, श्रुत बोध,द्वन्द कोष आदि अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया । किलीच खाँ की मृत्यु पर भी आप को गहरा सदमा लगा ।
कविवर के जीवन में सबसे बड़ा दुख संतान का रहा। तीन विवाह हुए और तीनों पत्नियों से नौ संतान हुई परंतु जीवित एक भी नहीं रही । अंतिम बालक जिसकी सेवा सुश्रुषा में कोई कमी नहीं रखी मात्र 9 वर्ष की आयु में स्वर्ग सुधार गया।अल्पवय ही बालक निपुण,वाकपटु तथा मन को मोहने वाला था। इस बालक की मृत्यु से आपको गहरा आघात लगा। आपने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा-
नों बालक हुए मूए, रहे नारि नर दोय।ज्यों तरुवर पतझार ह्वै, रहे ठूंठ से दोय।।
एक घटना शाहजहां के दरबार की है। उनके दरबार में कविराज की बहुत प्रतिष्ठा थी। वे प्रतिदिन दरबार में उपस्थित होते और बादशाह के साथ नियमित शतरंज खेलते।
एक बार बनारसीदास अपने मित्र और उसके ससुर के साथ पटना जा रहे थे कि चोरों के एक गांव में जा पहुंचे। चोर ब्राह्मण को नहीं सताते थे और जनेऊ ब्राह्मण का चिन्ह था इसलिए इन तीनों ने उस समय सूत से जनेऊ बंटकर पहन लिए। मस्तक पर तिलक लगा लिया और श्लोक पढ़ कर उन्हें आशीर्वाद दिया। फल यह हुआ कि चोरों के चौधरी ने इन्हें ब्राह्मण समझ कर आराम से अपनी चौपाल पर ठहराया और दूसरे दिन आदर पूर्वक विदा कर दिया। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि उस समय जैन श्रावक जनेऊ नहीं पहनते थे और ब्राह्मण चोरों के लिए भी पूज्य थे।
कविवर की प्रतिज्ञा थी कि वे जिनेंद्र देव की अतिरिक्त किसी को नमस्कार नहीं करते। बादशाह को जब यह बात पता लगी तो उन्होंने परीक्षा लेने की सोची । वह ऐसे स्थान पर बैठे जिसका द्वार छोटा था। बिना सिर नीचे किए प्रवेश कर पाना कठिन था । कविवर को मिलने के लिए बुलाया गया । वह द्वार पर आते ही ठिठक गए और बादशाह की चालाकी भांप गये। उन्होंने द्वार पर आते ही पहले एक पैर अंदर डाला और फिर दूसरा पैर अंदर डालकर बिना झुके प्रवेश कर गए । बादशाह उनकी इस बुद्धिमानी से प्रसन्न हुए और कहा कविराज आज तुम्हें जो मांगना हो मांग लो मैं तुम्हारी तत्परता और बुद्धिमानी से अत्यंत प्रसन्न हूं। कविवर ने तीन बार वचनबद्ध कर कहा- जहांपनाह आज के पश्चात अब कभी दरबार में मुझे आने के लिए ना कहा जाए। बादशाह सुनकर स्तब्ध रह गए। दुखित और उदास मन से उन्हें वचन दिया। इसके बाद कविवर कभी दरबार में नहीं गए बस चिंतन मनन लेखन और आत्मध्यान में लीन रहना ही उनके जीवन का अंग बन गया। बनारसी दास जी ने अपने जीवन में अर्द्ध कथानक,समयसार नाटक,नवरस पदावली,नाममाला एवं बनारसी विलास इन 5 काव्यकृतियों की रचना की। भक्ति काल के इस महाकवि को उनके जन्मदिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि।
*जर्नलिस्ट डा.अखिल बंसल*









