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अंधकार से प्रकाश की ओर लाने का पर्व : मकर सक्रांति

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मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण में आते हैं l
मकर सक्रांति के दिन देवताओं का दिन शुरू होता है l

ज्ञान और चेतना का प्रतीक : मकर संक्रांति

अतिवीर जैन * पराग * पूर्व उपनिदेशक, रक्षा मंत्रालय,मेरठ, उत्तर प्रदेश

जब सूर्य भगवान दक्षिणायन से उत्तरायण में आते हैं , यानी धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते है तो वह दिन मकर सक्रांति कहलाता है l जिस प्रकार हमारी बारह घंटे का रात और बारह घंटे के दिन होती है ,उसी प्रकार देवताओं की छह महीने की रात्रि और छह महीने का दिन मिलाकर एक दिन होता है l छह महीने की रात्रि में सूर्य दक्षिणायन यानी धनु राशि में रहते हैं l और जब देवताओं का दिन होता है तो सूर्य उत्तरायण यानि मकर राशि मे आ जाते है l इस दिवस को मकर सक्रांति कहा जाता है l यह दिन सूर्य देवता की पूजा के रूप में मनाया जाता है l

जैन धर्म की मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जो अयोध्या के राजा थे, के पुत्र चक्रवर्ती भरत महाराज ने सूर्य के अंदर स्थित जैन मंदिर के दर्शन अपने चौरासी मंजिले महल की खिड़की से किए थे l जैन शास्त्रों के अनुसार सूर्य का आकार सिद्ध शिला जैसा है l यानी उल्टे हुए क्षत्र के समान l यह नीचे से ठोस अर्ध गोलाकार और ऊपर से समतल होता है l इस समतल सतह पर ही अक्रत्रिम जिन मंदिर बने हुए हैं l सूर्य भ्रमण करता हुआ प्रथम गली से अंतिम गली 184 गलियों में 510 योजन क्षेत्र में भ्रमण करता है l जब यह प्रथम गली में होता है तो पृथ्वी के सबसे पास होता है l सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है l इसी कारण इसे मकर संक्रांति कहा जाता है l इस दिन से ही रातें छोटी और दिन बड़ा होना शुरू हो जाता है l इस समय सूर्य निषध पर्वत के ऊपर आ जाता है l और उसका समतल हिस्सा चक्रवर्ती को अपने चक्षुस्पर्श नेत्रों से दिखाई देता है l जिससे सूर्य के समतल भाग पर स्थित जिन बिंबो के दर्शन होते हैं l सूर्य विमान में जिन बिंबो के दर्शन होने पर चक्रवर्ती भरत ने अष्ट द्रव्यों से बिम्बों का पूजन किया l जैन धर्म में भगवान का पूजन अभिषेक अष्ट द्रव्यों से किया जाता है l अष्ट द्रव्यों में जल को भी एक द्रव्य माना गया है l और भरत चक्रवर्ती ने जल से सूर्य विमान में स्थित बिम्बों का पूजन अभिषेक किया l जिसे देखकर उस समय के ब्राह्मणों ने समझा की महाराज भरत सूर्य को अर्घ दे रहे हैं l और तब से ही सूर्य को जल से अर्घ देने की परंपरा लोक में चल पड़ी l
जिन बिम्बों की पूजा के बाद चक्रवर्ती भरत ने तिल के लड्डुओं का दान किया l जिसे तिमिकदान भी कहा जाता है l जैन धर्म में मकर संक्रांति की कोई जैन धार्मिक पर्व के रूप में मान्यता नहीं है l पर इसे लोक पर्व के रूप में ऋतु परिवर्तन के कारण जुड़ा हुआ माना जाता है l इस पर्व पर जैन अहिंसा का पालन करते हुए पतंगे उड़ाने का विरोध करते हैं l पतंग उड़ाने को संकल्पी हिंसा माना गया है , क्योंकि मंजे से पक्षियों की जान जाती हैं l दान पुण्य पर जोर देते हैं l तिल, गुड़ ,अन्न, वस्त्रो का गरीबों को दान करते हैं l इस अवसर पर कोई विशेष धार्मिक जैन अनुष्ठान नहीं होता l लोक व्यवहार के कारण इसे लोक पर्व कहा जाता है l

भारतीय पुराणों के अनुसार मकर सक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर एक महीने के लिए जाते हैं l क्योंकि मकर राशि का स्वामी शनि है l हालांकि ज्योतिष दृष्टि से सूर्य और शनि में तालमेल नहीं होता l लेकिन मकर राशि मे प्रवेश के कारण सूर्य खुद अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं l इसलिए इस महीने को पिता और पुत्र के संबंधों को निकटता के रूप में भी देखा जाता है l सूर्य के मकर राशि में आने के प्रभाव से दिन बड़ा और रात्रि छोटे होने लगती है l प्राणियों में आत्मा की शुद्धि और संकल्प शक्ति बढ़ती है l ज्ञानतंत्र विकसित होते हैं l किसान अपनी फसल काटते हैं l और मकर सक्रांति एक चेतना के रूप में परिलक्षित होती है l मौसम में परिवर्तन हो जाता है l इस दिन सूर्य देव की उपासना विशेष रूप से की जाती है l हरिद्वार , काशी , प्रयागराज , गंगासागर आदि सभी तीर्थों पर श्रद्धालु लोग स्नान आदि करके पुण्य कमाते हैं l पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन संक्रांति ने राक्षस किंकरासुर का वध किया था l इसलिए भी मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है l
महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह को अपनी इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था l उन्होंने देह त्याग के लिए मकर सक्रांति के दिन को ही चुना था l ऐसी मान्यता है की मकर संक्रांति के दिन देह त्याग से मोक्ष प्राप्ति होती है l मकर सक्रांति के दिन ही ऐसा माना जाता है कि गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर बंगाल की खाड़ी के सागर में जा मिली थी l यहां पर राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की राख का तर्पण किया गया था l बंगाल में इस स्थान को गंगासागर कहते हैं l जहां पर आज भी मकर सक्रांति के दिन बहुत बड़ा मेला लगता है l जिसमें लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाते हैं l
मकर सक्रांति के दिन को अंधकार के नाशक और प्रकाश के आगमन के दिवस के रूप में भी देखा जाता है l इस दिन पुण्य , दान ,धार्मिक अनुष्ठानों का हिंदू धर्म में विशेष महत्व होता है l गुड़ , चावल, तिलों ,खिचड़ी का दान विशेष रूप से किया जाता है l मकर सक्रांति का त्यौहार पूरे देश में मनाया जाता है l आज के दिन लोग खूब पतंग उड़ाते हैं पूरा आसमान पतंगों से ढक जाता है l पूरे दिन वो काटा वो काटा की आवाज सुनाई देती रहती हैं l
अलग अलग राज्य में अलग अलग नाम से इसको लोग जानते हैं l उत्तर प्रदेश और पश्चिम बिहार में इसे खिचड़ी का पर्व कहते हैं l तमिलनाडु में इसे पोंगल के नाम से जाना जाता है l आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में मकर शंकर मामा के नाम से जाना जाता है l बुंदेलखंड , मध्यप्रदेश में मकर सक्रांति को सकरात नाम से जानते हैं l पंजाब में लोहड़ी के नाम से बनाया जाता है l कश्मीर में शिशिर संक्रांत नाम से जाना जाता है l
नेपाल में संक्रांति कहते है l थाइलैंड में इसे सोंगकर्ण नाम से बनाते हैं l श्रीलंका में उलावर नाम से लोग जानते हैं l इस प्रकार हम देखते हैं कि मकर सक्रांति का पर्व देश ही नहीं विदेशों में भी बड़ी धूमधाम से अलग अलग नाम से बनाया जाता है l श्रद्धालु इस दिन दान दक्षिणा देकर पुण्य कमाते हैं , नदियों में स्नान करते हैं l मकर संक्रांति हमारे हिन्दुत्व , सनातन धर्म ,ध्यान ,अध्यात्म का वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक पर्व है l

लेखक:- इंजी. अतिवीर जैन * पराग *
पूर्व उपनिदेशक, रक्षा मंत्रालय
कवि, लेखक , व्यंग्यकार एवं
साहित्यकार,स्वतंत्र पत्रकार ,
स्तंभकार व सामाजिक कार्यकर्त्ता

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Author: Editor

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