पिता की गठरी

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जो घर की हर चिंता,

सारी समस्याएं बच्चों के सपने , मन के ताने बाने सबको एक गठरी में बांधे,

रखे हमेशा मन के काधे

ना ही इसे कभी उतारे

नाही उसके बोझ से हारे

इस गठरी को नाही खोले

ना हीकिसी को दिखलाये

उसकी आंखें मन की गहराई

तक नहीं जाती

सुनी रहती लेकिन आंसूओ का साथ नहीं पाती

सारी मुश्किलों सारी बाधाओ

में वो जो सदा गतिमान रहे

कभी नहीं माने हार हर क्षण ऊर्जावान रहे

कहां उसने एक दिन ईश्वर से

कि उसको नहीं शिकायत किसी से,

ना ही मन में कोई कड़वाहट है

उसकी गठरी में तो नूतन सपनों की आहट है

वह आभारी है इस गठरी का

इसमें रखी हर जिम्मेदारी का

चाहे हल्की हो या भारी हो हर पहरेदारी का

इस गठरी ने उसको हिम्मत दी है दुनिया में रहने की

मुश्किल धाराओं में बहने की

सारी तकलीफों को सहने की

चुप्पी में सारी बात कहने की

इस गठरी में उसे जिंदगी की उम्मीद है

सब कुछ हारकर जिंदगी को जीतने की जिद है

यह गठरी ही उसके चारों धाम है

इस गठरी की वजह से उसकी खूबसूरत हर शाम है

गठरी थामे यह शख्स पिता के अलावा कौन हो सकता है

कौन जिम्मेदारियां के तले अपना वजूद खो सकता है

यह जीवित व्यक्ति सृष्टि का बहुत बड़ा दरख़्त है

जो अंदर से कोमल बाहर से सख्त है,

इस दरख़्त से हर सपने की विजय है,

इस दरख़्त से हर निराशा की पराजय है ।।

                                          – राजेश मुथा एडवोकेट, जयपुर

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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