डा. अखिल बंसल
फरवरी माह आते ही वैलेंटाइन वीक की चर्चा आरंभ हो जाती है। रोज़ डे, प्रपोज़ डे, चॉकलेट डे, टेडी डे, प्रॉमिस डे, हग डे और किस डे—इन सात दिनों को आधुनिक समाज ने प्रेम की अभिव्यक्ति के विभिन्न प्रतीकों से जोड़ दिया है। युवाओं में इसका विशेष आकर्षण है और सोशल मीडिया ने इसे और भी व्यापक बना

दिया है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या प्रेम केवल प्रतीकों और एक सप्ताह के उत्सव तक सीमित है?
वास्तव में प्रेम मानव जीवन की एक गहरी और व्यापक भावना है। वह केवल प्रेमी-प्रेमिका के संबंध तक सीमित नहीं, बल्कि माता-पिता, गुरु, मित्र, समाज और समस्त जीव-जगत तक विस्तृत होता है। भारतीय परंपरा और दर्शन प्रेम को संयम, मर्यादा और उत्तरदायित्व से जोड़कर देखते हैं। यहाँ प्रेम केवल पाने की इच्छा नहीं, बल्कि देने की भावना है।
वैलेंटाइन वीक का वर्तमान स्वरूप कहीं-न-कहीं बाज़ारीकरण का शिकार हो गया है। उपहार, दिखावा और सोशल मीडिया पर तुलना—इन सबके बीच प्रेम का मूल भाव दब जाता है। युवा वर्ग पर यह दबाव भी बनता है कि यदि वे इस सप्ताह किसी संबंध में नहीं हैं, तो वे पीछे रह गए हैं। यह मानसिकता आत्मसम्मान और स्वाभाविकता दोनों को प्रभावित करती है।
दर्शन की दृष्टि से प्रेम तब सार्थक होता है, जब उसमें दूसरे के अस्तित्व, भावनाओं और सीमाओं का सम्मान हो। जैन दृष्टि विशेष रूप से यह सिखाती है कि प्रेम अहिंसा से जुड़ा हो—न विचारों में हिंसा, न शब्दों में, और न व्यवहार में। यदि प्रेम किसी को मानसिक तनाव, भय या दबाव देता है, तो वह प्रेम नहीं, मोह या आसक्ति है।
वैलेंटाइन वीक को यदि सही अर्थों में मनाया जाए, तो यह आत्ममंथन का अवसर बन सकता है। रोज़ डे केवल फूल देने तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन में कोमलता और संवेदना लाने का प्रतीक बने। प्रॉमिस डे केवल वादों का दिन न होकर जिम्मेदारी निभाने की चेतना जगाए। हग और अपनापन केवल शारीरिक नहीं, भावनात्मक सुरक्षा का संदेश दें।
समाज के लिए आवश्यक है कि वह वैलेंटाइन वीक को न तो अंधविरोध की दृष्टि से देखे और न ही अंधानुकरण की दृष्टि से। संतुलन ही समाधान है। परिवार, शिक्षक और मीडिया मिलकर युवाओं को यह समझाएँ कि प्रेम का वास्तविक मूल्य दिखावे में नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद और सम्मान में है।
अंततः प्रेम किसी सप्ताह का विषय नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है। यदि वैलेंटाइन वीक हमें रिश्तों में संवेदनशीलता, संयम और मानवीय मूल्यों की याद दिलाए, तो यह सप्ताह सार्थक बन सकता है।
प्रेम को तिथि नहीं, दृष्टि चाहिए—और वही प्रेम समाज को सुदृढ़ बनाता है।
*डा. अखिल बंसल, जयपुर*









