जयपुर
बंगाल के पुलिस महकमे में इस वक्त जो हलचल है, वह किसी बड़े प्रशासनिक संकट की आहट जैसी महसूस होती है। दरअसल, राज्य के अगले पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति का मामला अब केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी त्रिकोणीय जंग बन गया है जिसमें एक तरफ राज्य सरकार की मर्जी है, दूसरी तरफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के नियम और तीसरी तरफ अदालती आदेशों की तलवार।
इस पूरे विवाद के केंद्र में दो बड़े नाम हैं, वर्तमान कार्यवाहक डीजीपी राजीव कुमार और अपनी दावेदारी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे 1990 बैच के आईपीएस राजेश कुमार। पूरे मामले की खोजबीन करें तो पता चलता है कि यह विवाद उस वक्त गहराया जब राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने दिशा-निर्देशों को दरकिनार करते हुए करीब एक साल से ज्यादा समय तक राजीव कुमार को ‘कार्यवाहक’ पद पर बनाए रखा। राजेश कुमार झुंझुनू जिले के गांव मुकुंदगढ़ के मूल निवासी है ।
नियम कहते हैं कि डीजीपी की नियुक्ति के लिए नामों का पैनल पद खाली होने के तीन महीने पहले ही यूपीएससी को भेज देना चाहिए, लेकिन बंगाल सरकार ने इसमें डेढ़ साल की देरी कर दी। जब जुलाई 2025 में लिस्ट भेजी गई, तो यूपीएससी ने उसे यह कहकर लौटा दिया कि इतनी बड़ी देरी के बाद अब मामला बिना सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण के आगे नहीं बढ़ सकता।
यहीं से राजेश कुमार की भूमिका अहम हो जाती है। राजस्थान के निवासी और अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले राजेश कुमार ने महसूस किया कि वरिष्ठता सूची में ऊपर होने के बावजूद उन्हें इस पूरी प्रक्रिया में नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) का दरवाजा खटखटाया और वहां से एक ऐसा आदेश हासिल किया जिसने पूरे सिस्टम को हिला दिया। कैट ने न केवल राजेश कुमार के नाम पर विचार करने को कहा, बल्कि UPSC को 29 जनवरी तक चयन प्रक्रिया पूरी करने की कड़ी डेडलाइन भी दे दी।
कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब यूपीएससी ने इस डेडलाइन को मानने के बजाय दिल्ली हाईकोर्ट का रुख कर लिया। यूपीएससी का तर्क बेहद गंभीर है । उसका कहना है कि किसी संवैधानिक संस्था को इस तरह समय सीमा में बांधकर काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब राज्य सरकार ने खुद नियमों की अनदेखी की हो। अब स्थिति यह है कि 31 जनवरी को राजीव कुमार का कार्यकाल खत्म हो रहा है, उनका विदाई समारोह भी हो चुका है, लेकिन बंगाल पुलिस का अगला मुखिया कौन होगा, इसका जवाब दिल्ली हाईकोर्ट के गलियारों में अटका हुआ है।
खोजपूर्ण नजरिए से देखें तो यह मामला केवल एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि इस बात का उदाहरण है कि कैसे प्रशासनिक देरी और आपसी खींचतान किसी राज्य की कानून-व्यवस्था के शीर्ष पद को अनिश्चितता के भंवर में डाल सकती है। अगर हाईकोर्ट से जल्द हरी झंडी नहीं मिली, तो बंगाल को 1 फरवरी से एक बार फिर किसी अस्थायी व्यवस्था के सहारे चलना होगा, जो न तो प्रशासन के लिए अच्छा है और न ही कानून की नजर में सही।









