— अरविंद जैन “बीमा”
मानव जीवन प्रकृति का अनुपम उपहार है। प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर ने समान रूप से चौबीस घंटे दिए हैं—न अधिक, न कम। यही चौबीस घंटे किसी को अर्श तक पहुँचा देते हैं और किसी को अश्क की सीमा में रोक देते हैं। ऐसे कई उदाहरण आपके आसपास या देश, दुनिया में नजर आते हैं। अंतर केवल इतना है कि एक व्यक्ति समय का प्रबंधन करता है और दूसरा समय को व्यर्थ गंवा देता है। यही समय-व्यवस्था, यही प्राथमिकताएँ और यही संयम जीवन प्रबंधन का मूल मंत्र हैं।
समय का अपचय नहीं, समय का संचय
एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी, जो अत्यधिक व्यस्तता के कारण अपने लिए समय निकाल पाना कठिन समझते थे, फिर भी लेखन उनका प्रिय शौक था। जब उनसे पूछा गया कि इतनी व्यस्तता के बीच वे लेखन के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं, तो उन्होंने मुस्कराकर कहा—“मैं समय चुरा लेता हूँ।”
यह वाक्य सिर्फ जवाब नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का अनुपम सूत्र है। उन्होंने अपनी जीवन-चर्या को इस प्रकार गढ़ लिया कि जब लिखने की प्रेरणा आती, वे अलसुबह उठकर अपने सपने और रचनात्मकता को पूरा करते। यह उदाहरण बताता है कि समय वहीं मिलता है, जहाँ उसकी कीमत समझी जाए।
हनुमान जी का सूत्र : सूक्ष्म और विराट का संतुलन
“हनुमान चालीसा की एक महत्वपूर्ण चौपाई की पंक्ति”— *“भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचंद्र के काज संवारे”* —जीवन प्रबंधन का अद्भुत दर्शन समेटे हुए है।
हनुमान जी आवश्यकता के अनुसार सूक्ष्म और विराट रूप धारण कर लेते थे।
सूक्ष्म रूप विनम्रता, धैर्य, और संयम का प्रतीक है।
विराट रूप आवश्यक कठोरता, क्षमता, और नेतृत्व की पहचान।
आज का मनुष्य जैसे ही थोड़ा ऊँचा पद पा लेता है, विनम्रता को किनारे रख देता है। किंतु सफल नेतृत्व का आधार यह है कि व्यक्ति अपनी ऊँचाई के साथ व्यवहार की सादगी भी बनाए रखे। एक शायर की पंक्तियाँ इस सत्य को और स्पष्ट करती हैं—
“वो एक शख्स जो तुझसे पहले तख़्तनशीं था,
किस बात का गुरूर?
न किसी का तख़्त रहता है, न ताज रहता है।”
जीवन शतरंज की बिसात की तरह है—अंत में बादशाह और प्यादे एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं। फिर अहंकार किस बात का?
नेतृत्व में प्रबंधन की कसौटी:
एक श्रेष्ठ प्रबंधक वही है जिसका आचरण ऊँचा हो, जिसका व्यवहार प्रेरक हो, और जिसकी नीतियाँ स्पष्ट हों। अधीनस्थ व्यक्ति तभी अनुसरण करता है जब:
1. उसे अपने प्रबंधक की योग्यता पर भरोसा हो,
2. उसे विश्वास हो कि समय पड़ने पर सही मार्गदर्शन मिलेगा,
3. वह महसूस करे कि उसका नेता केवल आदेश देने वाला नहीं, बल्कि साथ चलने वाला है।
सच्चा प्रबंधक अपने सहायक को अवसर देता है, निकटता देता है, और उसकी क्षमताओं को उभारता है। किसी श्रेष्ठ व्यक्ति का सानिध्य स्वयं में एक पुरस्कार होता है—यह प्रेरणा देता है, ऊर्जा देता है, और व्यक्ति की सीमाओं को विस्तार देता है।
केयरिंग, शेयरिंग और हेल्पिंग का सिद्धांत,
आधुनिक प्रबंधन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्र है—
“दूसरों की हँसी में शामिल हो, पर दुख में भी हिस्सेदार बनो।”
सिर्फ मदद कर देने से जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती; इंसान की पीड़ा में मन से शामिल होना ही असली मानवीयता है। इसे आज की भाषा में “पर्सनल टच” कहा जाता है। यही व्यवहार सहानुभूति, विश्वास और आत्मीयता का आधार बनता है।
व्यवहार की गुणवत्ता ही व्यक्तित्व की गुणवत्ता
जीवन प्रबंधन का आधार हमारे व्यवहार और आचरण में निहित है।
चतुराई हो पर कुटिलता नहीं।
अपडेट रहें पर दिखावा नहीं।
व्यक्तित्व पारदर्शी हो पर बचकानापन नहीं।
सत्य बोलें पर कटुता से बचें।
काम तुरंत करें पर हड़बड़ी नहीं।
व्यस्त रहें पर अस्त-व्यस्त नहीं।
मनुष्य का व्यक्तित्व तभी प्रभावी होता है जब वह सादगी, स्पष्टता और संतुलन का अभ्यास करे।
निरंतरता ही सफलता का मंत्र:
स्वास्थ्य के संदर्भ में देखें तो जो व्यक्ति नियमित और अनुशासित रहता है, वह अधिक स्वस्थ रहता है। रोग शरीर पर कम और लापरवाही पर अधिक हमला करते हैं। मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर लगातार सक्रिय रहना आवश्यक है। सफल व्यक्ति वही है जो सुबह, दिन और रात—हर समय अपने लक्ष्यों के साथ जुड़ा रहता है।
सुव्यवस्थित व्यक्ति की उन्नति निश्चित
जीवन प्रबंधन का मूल सिद्धांत यह है कि व्यक्ति सरल, सहज और सुव्यवस्थित हो।
सरल व्यक्ति सत्यनिष्ठ और स्पष्ट सोच रखता है।
सहज व्यक्ति परिपक्व और दूरदर्शी निर्णय लेता है।
सुव्यवस्थित व्यक्ति मेहनत से थकता नहीं, क्योंकि उसके पास दिशा होती है।
इन तीन गुणों के बिना कोई भी बड़ी उड़ान संभव नहीं। परिश्रम तब ही फल देता है जब वह इन गुणों से संलग्न हो।
निष्कर्ष : जीवन प्रबंधन एक निरंतर साधना है
जीवन प्रबंधन कोई तकनीक नहीं, बल्कि एक निरंतर साधना है
समय को आदर देना,
व्यवहार को सुसंस्कृत रखना,
विचारों को उच्च रखना,
कर्म को संतुलित करना,
और व्यक्तित्व को संयमित रखना।
जो व्यक्ति इन सिद्धांतों को अपनाता है, वह निश्चित ही सफलता, संतुष्टि और सम्मान प्राप्त करता है। जीवन वही सार्थक है जो सादगी में महानता खोज ले और व्यस्तता में भी अपने सपनों के लिए समय चुरा ले।
जीवन प्रबंधन का यही मूल सिद्धांत है।
*अरविंद जैन”बीमा”*
एल.एल.बी.,एम. कॉम.,एम.ए.
20, शंकु मार्ग फ्रीगंज उज्जैन
संप्रति: सेवानिवृत विकास अधिकारी









