डा. अखिल बंसल
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर हस्ताक्षर हो चुके हैं। सरकार इसे ऐतिहासिक उपलब्धि और आर्थिक प्रगति का द्वार बता रही है, पर किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते की तरह इसका मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव और परिणामों से होना चाहिए। समझौता हो जाना सफलता की गारंटी नहीं है—असली परीक्षा अब शुरू होती है।
सरकार का दावा है कि इस डील से भारत को अमेरिकी बाज़ार में बेहतर पहुँच, निवेश में वृद्धि और तकनीकी सहयोग मिलेगा। आईटी, फार्मा, रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में अवसरों की बात कही जा रही है। काग़ज़ पर ये सभी दावे आकर्षक लगते हैं, किंतु यह पूछना आवश्यक है कि इन अवसरों का लाभ किसे मिलेगा—देश के आम उद्यमी को या केवल बड़े कॉरपोरेट समूहों को?
सबसे बड़ी चिंता कृषि और लघु उद्योग क्षेत्र को लेकर है। अमेरिकी कृषि उत्पाद अत्यधिक सब्सिडी के साथ आते हैं। यदि भारतीय बाज़ार में इनके लिए रास्ते खुले और सुरक्षा उपाय कमजोर रहे, तो इसका सीधा नुकसान भारतीय किसानों को होगा। इसी प्रकार, छोटे और मझोले उद्योग पहले ही महंगी ऊर्जा, कर्ज़ और प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं। ट्रेड डील उनके लिए अवसर बनेगी या अतिरिक्त दबाव—यह अभी अस्पष्ट है।
बौद्धिक संपदा अधिकार, डेटा सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं से जुड़े प्रावधान भी गंभीर समीक्षा की माँग करते हैं। क्या भारत ने अपनी नीति-स्वायत्तता को सुरक्षित रखा है? क्या दवाइयों की कीमतों, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और डेटा नियंत्रण पर भविष्य में किसी तरह का दबाव बढ़ेगा? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सरकार को देश के सामने रखने होंगे।
‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ की बार-बार चर्चा की जाती है, लेकिन ट्रेड डील का वास्तविक स्वरूप यह तय करेगा कि ये नारे ज़मीनी सच्चाई बनेंगे या केवल भाषणों तक सीमित रह जाएंगे। यदि समझौते का लाभ आयात बढ़ाने तक सिमट गया और उत्पादन भारत के बाहर रहा, तो आत्मनिर्भरता का दावा खोखला सिद्ध होगा।
भू-राजनीतिक दृष्टि से अमेरिका के साथ निकटता भारत के लिए रणनीतिक लाभ हो सकती है, पर रणनीति के नाम पर आर्थिक हितों से समझौता करना दूरदर्शिता नहीं कहलाता। साझेदारी का अर्थ समानता होता है, न कि दबाव में लिए गए निर्णय।
समन्वय वाणी का स्पष्ट मत है कि भारत–अमेरिका ट्रेड डील को सरकार की उपलब्धि मानने से पहले उसके हर प्रावधान की सार्वजनिक और पारदर्शी समीक्षा आवश्यक है। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह यह सिद्ध करे कि यह समझौता किसानों, श्रमिकों, लघु उद्योगों और आम उपभोक्ताओं के हित में है—सिर्फ़ आंकड़ों और दावों में नहीं, बल्कि ज़मीनी सच्चाई में।
समझौता हो चुका है, अब सवाल यह है—क्या यह देश को मजबूत करेगा या भविष्य में नई चुनौतियों का कारण बनेगा? इसका उत्तर आने वाले निर्णय और क्रियान्वयन देंगे।
*डा. अखिल बंसल, जयपुर*









