आज जैन समाज एक गंभीर और चिंताजनक दौर से गुजर रहा है। जनसंख्या के दृष्टिकोण से देखें तो जैन समाज देश के सबसे छोटे अल्पसंख्यक समुदायों में से एक बन चुका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पारसी समाज (0.006%) के बाद जैन समाज की जनसंख्या मात्र लगभग 0.4% रह गई है। यह स्थिति तब और अधिक पीड़ादायक हो जाती है जब हम यह देखते हैं कि जैन समाज देश में सबसे अधिक राजस्व, कर, समाजसेवा, गौशाला संचालन और परोपकारी संस्थाओं का संचालन करने वाला समाज है।
शहरी क्षेत्रों में आज भी जैन मंदिरों की संख्या प्रचुर मात्रा में है, किंतु विडंबना यह है कि जैन समाज स्वयं शहरों के पुराने क्षेत्रों को छोड़कर दूरस्थ कॉलोनियों में बसता जा रहा है। परिणामस्वरूप अनेक प्राचीन एवं ऐतिहासिक जैन मंदिर वीरान होते जा रहे हैं। दर्शनार्थियों का अभाव बढ़ रहा है और उनकी देखरेख एवं सुरक्षा भी एक गंभीर प्रश्न बनती जा रही है।
चिंता का विषय यह भी है कि समाज की घटती जनसंख्या के बावजूद विभिन्न स्थानों पर विशाल और भव्य नए मंदिरों के निर्माण की प्रेरणा निरंतर दी जा रही है। इन मंदिरों में सोना-चांदी एवं बहुमूल्य सामग्री का अत्यधिक उपयोग किया जाता है, जबकि भविष्य में इन मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या और सुरक्षा व्यवस्था दोनों ही अनिश्चित दिखाई देती हैं। इतिहास साक्षी है कि एक समय मंदिरों की संपत्ति लूटी गई थी—क्या भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा नहीं बन सकतीं? इस पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।
आज की युवा पीढ़ी उच्च शिक्षा, करियर और विदेशों में बसने की आकांक्षा के कारण मंदिरों एवं धार्मिक गतिविधियों से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। इसके साथ ही कम उम्र में वैराग्य की ओर प्रेरणा, देर से विवाह, एक या शून्य संतान की प्रवृत्ति तथा लड़कियों का अंतर्जातीय प्रेम विवाह भी जैन समाज की जनसंख्या को और संकुचित कर रहे हैं।
समय की मांग है कि नए मंदिरों के निर्माण से पहले प्राचीन मंदिरों के संरक्षण, सुरक्षा एवं पुनर्जीवन पर ध्यान दिया जाए। गत वर्ष मुंबई में एक जैन मंदिर तोड़ने की घटना हो चुकी है। इसी प्रकार दिल्ली में पर्यूषण पर्व के दौरान एक मांसाहारी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा पूजा कार्य में विघ्न उत्पन्न किया गया था।
यदि आवश्यकता हो तो उपेक्षित मंदिरों की प्रतिमाओं को सक्रिय मंदिरों में विधिपूर्वक विराजमान किया जाए। भगवान को सोना-चांदी से मढ़े भव्य मंदिरों की नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा, भक्ति और सदाचार की आवश्यकता होती है—यही जैन दर्शन का मूल संदेश है।
इसके साथ ही जैन समाज का दिगंबर, श्वेतांबर एवं अन्य पंथों में बिखराव भी भविष्य के लिए चिंताजनक है। संतों के आवागमन, जलसों एवं विधानों में होने वाला अत्यधिक खर्च भी आत्मचिंतन की मांग करता है। सभी पंथों में एकता, समन्वय और सहयोग आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
किसी भी समाज की मांगों की सुनवाई तभी होती है जब उसके पीछे जनसंख्या और संगठित नेतृत्व का दबाव हो। दुर्भाग्यवश आज राजनीति में जैन समाज का प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त प्रायः हो गया है। समाज के जिस भी व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता हो, उसे सभी पंथों द्वारा एकमत होकर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
आवश्यक है कि बच्चों में बचपन से देव-दर्शन, संस्कार और धार्मिक जुड़ाव विकसित किया जाए। साथ ही युवा दंपतियों को अधिक संतानों के लिए प्रोत्साहित करने हेतु शिक्षा, चिकित्सा और आर्थिक सहयोग की योजनाएं समाज स्तर पर बनाई जाएं। मिशनरी संस्थाओं की भांति जैन समाज को भी जैन विद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों की स्थापना पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जिससे संख्या के साथ संस्कार भी सुरक्षित रहें।
साधु-संतों से विनम्र निवेदन है कि वे युवा पीढ़ी को कम आयु में वैराग्य की ओर प्रेरित करने के बजाय उन्हें पहले पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन का अवसर प्रदान करें। प्रौढ़ अवस्था में वैराग्य का मार्ग अधिक संतुलित और समाजोपयोगी सिद्ध हो सकता है।
हमारे पूर्वजों के समय 8–9 भाई-बहन सामान्य बात थी, किंतु आज एकल संतान या निःसंतान जीवन को प्राथमिकता दी जा रही है। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में जैन समाज के विलुप्त होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। तब हमारे मंदिर, धर्मशालाएं और संस्थाएं दूसरों के अधीन चली जाएंगी—यह विचार ही अत्यंत पीड़ादायक है।
यह लेख किसी पर आरोप नहीं, बल्कि समाज के प्रति पीड़ा, चिंता और आत्ममंथन की पुकार है। समय रहते यदि हमने दिशा नहीं बदली, तो भविष्य हमें क्षमा नहीं करेगा।
सभी साधु-संतों एवं समाज के प्रबुद्धजनों के चरणों में सादर वंदन करते हुए यही प्रार्थना है कि वे जैन समाज को संरक्षण, संतुलन और संवर्धन का सही मार्ग दिखाएं।
अरविंद जैन “बीमा”
(एम.ए.,एम.कॉम., एल.एल.बी.)
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