— अरविंद जैन “बीमा”
कल सुबह अख़बार खोला तो लगा जैसे किसी ने चाय में चीनी नहीं, सीधा करेला उबालकर डाल दिया हो। पहली ही सुर्ख़ी आँखों में चुभ गई—
“मेरा शहर स्मार्ट सिटी योजना में शामिल।”
ख़बर पढ़ते ही मन आशंकाओं से भर गया। सपने तो नींद में देखे जाते हैं, लेकिन जब सपने जागते हुए दिखाए जाने लगें, तब डर लगना स्वाभाविक है।
अख़बार हाथ में था, पर दिमाग़ एक विचित्र स्वप्न में प्रवेश कर चुका था। मैंने देखा—शहर से आवारा कुत्ते ग़ायब हैं। न गलियों में उनकी बैठक, न रात के सन्नाटे में उनकी चेतावनी भरी भौंक। अरे भैया, यह कैसी स्मार्ट व्यवस्था है? ये वही कुत्ते थे जो बिना वेतन, बिना ठेके और बिना शिकायत के हमारी सुरक्षा करते थे। रात के तीन बजे कोई संदिग्ध हरकत होती तो पुलिस से पहले यही सतर्कता फैलाते थे। अब स्मार्ट सिटी में सुरक्षा सीसीटीवी संभालेगा—जो अक्सर बिजली न होने पर खुद ही सो जाता है।
कुत्तों ने ही हमें फिट रहने का गुर सिखाया था। सुबह की सैर उनके बिना अधूरी लगती थी। कई लोग तो अपनी चुस्ती-फुर्ती का श्रेय इन्हीं को देते हैं। स्मार्ट सिटी में यह प्राकृतिक फिटनेस प्रोग्राम भी बंद! अब सब कुछ ऐप से होगा—चलना भी, हँसना भी, और शायद साँस लेना भी।
स्वप्न आगे बढ़ा। देखा—आवारा मवेशी भी ग़ायब। ये वही प्राणी थे जो ट्रैफिक व्यवस्था को चुनौती देकर हमारे धैर्य की परीक्षा लेते थे। कई लोगों ने इन्हीं की वजह से जीवन की नश्वरता को निकट से समझा। यमराज के ये अनौपचारिक सहायक अब स्मार्ट प्लानिंग की भेंट चढ़ चुके थे। लगता है, स्वर्ग-नर्क में भी निजीकरण लागू हो गया है।
फिर देखा—शहर की सड़कें खोदी जा रही हैं। कहा गया कि पीने के पानी और ड्रेनेज की पाइपलाइन डाली जाएगी। दोनों साथ-साथ चल रही थीं, जैसे वर्षों का बिछड़ा प्रेम फिर जाग उठा हो। अब यह कोई नहीं बता सकता कि नल से पानी आएगा या नाली का संदेश। स्मार्ट सिटी में रोमांच हर घूंट के साथ मुफ्त मिलेगा।
सड़कें बन चुकी थीं—इतनी चिकनी कि फिसलन में साबुन भी शर्मिंदा हो जाए। न गड्ढे, न पैबंद। मन में सवाल उठा—अब हमारी रीढ़ की हड्डी का व्यायाम कैसे होगा? वर्षों से जो प्राकृतिक झटके हमें सड़कों ने दिए, उनका विकल्प कौन देगा? जिम और योग केंद्र इतने सक्षम नहीं कि वह सेवा दे सकें जो हमारी सड़कें देती रही हैं।
नालियाँ ढँक दी गई थीं और सूअर भी लापता थे। ये वही जीव थे जो नगर निगम को आईना दिखाते थे। अब सफ़ाई पूरी तरह सरकारी भरोसे थी—और सरकारी भरोसे का परिणाम हम भलीभांति जानते हैं। नालियाँ ढँक जाने से हमारी पारंपरिक जीवन शैली भी संकट में थी। खुलेपन की संस्कृति को यह स्मार्टनेस रास नहीं आ रही थी।
भिक्षुक भी दिखाई नहीं दिए। मन उदास हो गया। अब पुण्य कमाने के अवसर कहाँ मिलेंगे? पाँच-दस रुपये दिए बिना दिन अधूरा लगता था। यह तो हमारी आध्यात्मिक अर्थव्यवस्था थी, जिसे स्मार्ट सिटी ने बिना वैकल्पिक योजना के बंद कर दिया।
सड़कों को चौड़ा किया गया। इतनी चौड़ी कि वाहन सीधा चलने लगा। न अचानक ब्रेक, न मोड़ पर ठेला। ड्राइविंग अब नीरस हो चुकी थी। वो मानसिक सजगता, वो हर पल का तनाव—सब बीते दिनों की बात हो गई। लगता है, स्मार्ट सिटी नागरिकों को ज़्यादा सुखी नहीं, ज़्यादा आज्ञाकारी बनाना चाहती है।
सबसे मनोरंजक दृश्य तब सामने आया जब करोड़ों की लागत से बनी पार्किंग को कुछ महीनों बाद ही तोड़ दिया गया। कारण बताया गया—नई स्मार्ट योजना। यह देखकर लगा कि विकास अब ज़रूरत नहीं, आदत बन चुका है। बनाना, तोड़ना और फिर बनाना—यह चक्र ही शायद स्मार्टनेस का मूल मंत्र है।
जनता? जनता तो दर्शक है। तालियाँ बजाती है, टैक्स देती है और अगली खुदाई का इंतज़ार करती है।
इसी सपने में मैं चिल्ला उठा—
“भैया, मेरे शहर को स्मार्ट सिटी मत बनाइए!”
हमें हमारी अव्यवस्थाएँ, हमारी जुगाड़ संस्कृति और हमारी परिचित परेशानियाँ ही प्यारी हैं।
अगर स्मार्ट सिटी का अर्थ यही है कि योजनाएँ बदलती रहें, सड़कें बार-बार टूटें और आम आदमी हर सुबह नए धैर्य के साथ निकले—तो ऐसा विकास आप ही को मुबारक।
घबराकर मेरी नींद खुल गई। राहत की साँस ली—शुक्र है, यह सिर्फ़ सपना था।
पर मन के किसी कोने में डर अब भी है—कहीं यह सपना सच न हो जाए।
— *अरविंद जैन “बीमा”*
20, शंकु मार्ग फ्रीगंज
उज्जैन









