भीष्म पितामह का जीवन भारतीय संस्कृति में धर्म, त्याग और कर्तव्य का ऐसा आदर्श है, जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि आत्मसात किया जाता है। उनका जन्म स्वयं गंगा के गर्भ से हुआ, अतः वे सामान्य मनुष्य नहीं, बल्कि दिव्य प्रयोजन से अवतरित महापुरुष थे। राजा शांतनु और माता गंगा के पुत्र देवव्रत के रूप में उनका आगमन उस युग में हुआ, जब पृथ्वी को ऐसे चरित्र की आवश्यकता थी, जो धर्म को केवल उपदेश न दे, बल्कि उसे अपने जीवन में उतार कर दिखाए।
गंगा की गोद लखे, जन्मा धर्म महान।
देवव्रत तन धारि के, उतरा नीति विधान॥
वशिष्ठ के आश्रम में प्राप्त शिक्षा ने देवव्रत को शस्त्र और शास्त्र दोनों में निष्णात बनाया। वे वीर भी थे और विवेकी भी, परंतु उनका सबसे बड़ा गुण था ,वचन के प्रति अटूट निष्ठा। जब पिता शांतनु के सुख के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य और राज्य त्याग की प्रतिज्ञा ली, तब इतिहास ने उन्हें देवव्रत नहीं, भीष्म के नाम से स्मरण किया। वह प्रतिज्ञा केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं थी, बल्कि संपूर्ण जीवन को अनुशासन में बाँधने का संकल्प थी।
राज-सुख तज दीन्ह सब, त्याग लिया संसार।
पितृ-वचन की खातिर, बन गए भीष्म अपार॥
भीष्म का संपूर्ण जीवन नियमों की कठोर साधना में व्यतीत हुआ। उन्होंने कभी अपने सुख को प्रधान नहीं माना। राज्य की सेवा, वंश की रक्षा और धर्म की मर्यादा यही उनके जीवन के आधार बने। वे जानते थे कि शक्ति से बड़ा धर्म होता है और धर्म से बड़ा कर्तव्य। इसलिए जब जीवन के अनेक मोड़ों पर उनके मन को पीड़ा हुई, तब भी उन्होंने अपने व्रत को भंग नहीं होने दिया।
वचन एक जो ठान लिया, प्राणों से भी प्यारा।
धर्म-पथ से डिगे नहीं, चाहे टूटे तारा॥
कुरु वंश के उत्थान और पतन दोनों के साक्षी भीष्म रहे। वे जानते थे कि अधर्म पनप रहा है, अन्याय हो रहा है, फिर भी वे राज्य-नियम और अपनी प्रतिज्ञा से बँधे रहे। यह मौन उनकी दुर्बलता नहीं, बल्कि कर्तव्य का कठोर रूप था। उनका जीवन यह प्रश्न उठाता है कि क्या हर सत्य तत्काल व्यक्त किया जाना चाहिए, या कभी-कभी मौन भी धर्म की सेवा बन जाता है।
महाभारत युद्ध में भीष्म का पतन नहीं हुआ, बल्कि उनका तप और भी उजागर हुआ। शत्रुओं के बाणों से बनी शरशय्या पर लेटे हुए उन्होंने मृत्यु को भी अपने नियमों में बाँध लिया। सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हुए वे जीवन की अंतिम घड़ी तक धर्मोपदेश देते रहे। उनका इच्छामृत्यु का वरदान केवल शक्ति नहीं था, वह संयम की पराकाष्ठा थी।
शर की सेज सुहावनी, तप का अंतिम द्वार।
मृत्यु भी रुकी रही, धर्म ही पहरेदार॥
आज के भौतिक और सुविधावादी युग में भीष्म पितामह का जीवन हमें आत्ममंथन के लिए विवश करता है। वे सिखाते हैं कि वचन हल्के नहीं होते, त्याग दिखावे का विषय नहीं होता और धर्म सुविधा से नहीं, साधना से निभाया जाता है। यदि समाज में आज भी चरित्र की नींव रखनी है, तो भीष्म जैसे जीवन-मूल्यों को पुनः समझना होगा।
सुख से ऊपर धर्म रख, यही भीष्म की रीत।
जीवन सार यही कहे, त्याग बने संगीत॥
भीष्म पितामह इतिहास की कथा नहीं, बल्कि आचरण की कसौटी हैं। उनका जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि महानता सत्ता से नहीं, संयम से आती है और अमरता देह से नहीं, धर्म से प्राप्त होती है।
*साधना मिश्रा विंध्य*
लखनऊ,उत्तर प्रदेश









