जीवन में दृढ़ता, समर्पण और अध्यात्म रुचि की जीती जागती मिसाल रहे श्री हंसमुख भाई वोरा।
सोनगढ़ में निवास करने वाले श्री हंसमुख भाई जीवन के 94 बसंत देखने के पश्चात आज विदा हो गए. बढ़वाण के मूल निवासी अपने पिता श्री पोपटलाल वोरा से उन्हें अध्यात्म रुचि विरासत में प्राप्त हुई और पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के समागम से अध्यात्म का अभ्यास किया। सन् 1962 से सोनगढ़ से जुड़े श्री हंसमुख भाई की विभिन्न शहरों में टाईल्स की 5 फैक्ट्रियां थीं लेकिन अध्यात्म की रुचि लौकिक क्षेत्र पर भारी पड़ गई और उन्होंने अपनी सारी फैक्ट्रियां बंद कर सोनगढ़ में ही स्थाई निवास कर लिया। सोनगढ़ में निर्मित परमागम मंदिर में गाथाओं को पत्थर पर उत्कीर्ण करने के लिए स्वयं इटली जाकर मशीन लेकर आए और पंच परमागम की सारी गाथायें पत्थर पर उत्कीर्ण करवाईं और उनकी अशुद्धियां भी दूर कीं और यह महान कार्य संपन्न किया। यह कार्य 5 महीने की अल्प अवधि में पूर्ण हो गया।
1981 में सोनगढ़ के श्री दिगंबर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख श्री रामजीभाई माणेकचंद दोशी के आग्रह पर ट्रस्ट के प्रमुख पद के दायित्व को स्वीकार किया। आप पिछले 46 वर्षों से श्री दिगंबर जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ के प्रमुख रहे। आपके ही नेतृत्व में जम्बूद्वीप एवं बाहुबली जिनायतन का ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। गुरुदेवश्री आपके पिताश्री का और आपका भी नाम अनेक बार अपने प्रवचनों में लिया करते थे।
आश्चर्य की बात यह रही कि श्री हंसमुख भाई वोरा पिछले 47 वर्षों से एक समय ही भोजन करते थे शाम को मात्र जल ग्रहण करते थे। जब मैंने उनसे पूछा कि आप एक समय भोजन करके इतने स्वस्थ कैसे रहते हैं? तो उन्होंने कहा कि दिगंबर मुनिराज भी तो एक समय भोजन करते हैं और अपनी आत्म आराधना करते हैं। भोजन से शरीर चलता है यह हमारा भ्रम है बल्कि हम जैसी दृढ़ता से नियम पालेंगे शरीर भी उसी अनुरूप कार्य करने लगता है। प्रातः 4 बजे उठकर 1 घंटे स्वाध्याय करना, उसके पश्चात व्यायाम और सैर करना उनकी दिनचर्या का प्रारंभिक चरण था। उसके पश्चात जिनमंदिर जाकर जिनेन्द्र पूजन, स्वाध्याय करना उनकी नियमित दिनचर्या रही। 94 वर्ष की उम्र में भी सोनगढ़ के सभी मंदिरों की वंदना पैदल, बिना लकड़ी की सहायता के करते रहे। अंत समय तक उन्हें कोई बीमारी नहीं थी। प्रतिदिन शाम को 8:00 बजे विश्राम करने वाले श्री हंसमुख भाई हमेशा प्रसन्न मुद्रा में दिखाई पड़ते थे। आपके परिवार में एक पुत्र श्री पीयूष वोरा मुम्बई और दो बेटियां हैं। सोनगढ़ में संचालित होने वाली सभी गतिविधियों में प्रमुखता से सहभागिता करने वाले श्री हंसमुख भाई विधानों में पूरे समय उपस्थित रहते थे और स्वयं विधान करवाते भी थे।
श्री हंसमुख भाई कहते थे कि जैन दर्शन का सार है कि बाहर में कुछ करने लायक है ही नहीं, जो कुछ करना है अपने स्वयं में करना है इसलिए जितनी जल्दी हो सके हमें आत्मलक्ष्य की ओर केंद्रित होना चाहिए।
साभार:
*# जिन देशना*
विराग शास्त्री, जबलपुर









