डॉक्टरेट का सस्ता बाज़ार : प्रतिष्ठा का क्षरण और समाज की चुनौती

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आज के दौर में जब शिक्षा, शोध और ज्ञान की प्रतिष्ठा सर्वोच्च मानी जाती है, वहीं दूसरी ओर “डॉक्टरेट” जैसी सर्वोच्च शैक्षणिक उपाधि का सरेआम अवमूल्यन एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनकर उभरा है। मात्र 10–15 हजार रुपये में “डॉ.” की उपाधि दिलाने का दावा करने वाली संस्थाएँ न केवल शिक्षा व्यवस्था का मज़ाक उड़ा रही हैं, बल्कि समाज की बौद्धिक विश्वसनीयता पर भी गहरा आघात कर रही हैं।

डॉक्टरेट, विशेषतः पीएच.डी., वर्षों के कठिन परिश्रम, शोध, अनुशासन और बौद्धिक ईमानदारी का परिणाम होती है। यह उपाधि केवल मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों द्वारा कठोर शैक्षणिक प्रक्रिया के बाद प्रदान की जाती है। परंतु आज कुछ तथाकथित एनजीओ, ट्रस्ट और निजी संगठन “ऑनरेरी डॉक्टरेट” के नाम पर खुलेआम उपाधियाँ बेच रहे हैं। यह न केवल विधिक रूप से अमान्य है, बल्कि नैतिक रूप से भी निंदनीय है।

विडंबना यह है कि समाज का एक वर्ग भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। बिना सत्यापन के “डॉ.” की उपाधि ग्रहण कर लेना, सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए शॉर्टकट अपनाना और मंचों पर ऐसे लोगों का सम्मान करना—ये सब मिलकर इस फर्जीवाड़े को पोषित कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल वास्तविक विद्वानों के साथ अन्याय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी गलत संदेश देती है कि मेहनत नहीं, बल्कि पैसे से पहचान खरीदी जा सकती है।

इस समस्या का समाधान केवल कानून से संभव नहीं है। यद्यपि (UGC) और सरकार के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि केवल मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय ही डिग्री प्रदान कर सकते हैं, फिर भी जमीनी स्तर पर सख्ती और जागरूकता का अभाव इस अवैध व्यापार को बढ़ावा दे रहा है। आवश्यकता है कि ऐसे मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई हो, ताकि एक उदाहरण स्थापित हो सके।

मीडिया, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। फर्जी संस्थाओं का खुलासा, जनजागरण अभियान और सत्यापन की संस्कृति को बढ़ावा देना समय की मांग है। साथ ही, हमें यह भी समझना होगा कि सम्मान और प्रतिष्ठा किसी उपाधि की मोहताज नहीं होती—वह व्यक्ति के कार्य, विचार और योगदान से अर्जित होती है।

अंततः यह प्रश्न केवल एक फर्जी डिग्री का नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक ईमानदारी का है। यदि हमने समय रहते इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगाई, तो वह दिन दूर नहीं जब “डॉक्टरेट” जैसी महान उपाधि केवल एक दिखावे का साधन बनकर रह जाएगी।

अब समय है कि हम सजग हों, सचेत हों और इस “सस्ते डॉक्टर बनने” की मानसिकता को ठुकराकर वास्तविक ज्ञान और परिश्रम को ही सम्मान दें—क्योंकि असली उपाधि वही है, जो समाज के मन में स्थायी विश्वास उत्पन्न करे।

 -जर्नलिस्ट डा. अखिल बंसल

YASH JAYSWAL
Author: YASH JAYSWAL

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