(राजेन्द्र बोडा की कलम से)
आज जयपुर की मानसागर (जलमहल) झील के किनारे दुनिया के सबसे पुराने ‘बर्ड फेयर’ ( पक्षी मेले) में भाग लेकर न केवल अतीव आनंद हुआ, बल्कि हमारा ज्ञान भी बढ़ा। इस साल का यह मेला कीटों के संरक्षण को समर्पित था।
इस मेले को 1997 में शुरू करने वालों में प्रमुख आदरणीय हर्षवर्धन के बुलावे पर न जाने की गुस्ताख़ी हम नहीं कर सकते थे इसलिए एक घंटे से अधिक समय में जयपुर के घनघोर ट्रैफिक की बाधाएं पार करके हम मेले में पहुंचे, जहां पक्षी प्रेमियों के साथ अनेक स्कूलों के बच्चे भी मौजूद थे।
आयोजकों ने बच्चों के साथ विशेषज्ञों का संवाद भी रखा था जिसमें हमने पाया कि प्रकृति का ज्ञान स्कूली बच्चों में भरपूर है और हमारी पीढ़ी भरोसा कर सकती है कि ये बच्चे बड़े होकर पर्यावरण को बचाने के सिपाही बनेंगे। हमने बहुत से बच्चों से दरियाफ़्त किया कि क्या वे आज के आयोजन के लिए तैयारी करके आए हैं तो यह जान कर अच्छा लगा कि नहीं, सभी को पर्यावरण और पशु पक्षियों के बारे में सहज जानकारियां थीं।
मेले के एक आकर्षण पश्चिमी रेगिस्तानी राजस्थान के खेतोलाई गांव के पंकज विश्नोई थे जिन्होंने लुप्त होती पक्षी प्रजाति गोडावण को बचाने के लिए अपने खेत दान कर दिए, जो पक्षी संरक्षण का अनुपम सामाजिक उदाहरण है।
हर्षवर्धन साहब अपने स्वभाव के अनुरूप इस बार भी पृष्ठभूमि में ही थे, मगर उनकी नज़र सब पर थी।









