वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र बोडा की कलम से
‘आज के दौर में वैज्ञानिक मानस’ विषय पर आज शाम गौहर रज़ा को सुनने का मौका मिला जो वैज्ञानिक सोच को लोगों का स्वभाव बनाने के लिए शिद्दत से लगे हुए हैं।
जनवादी लेखक संघ, राजस्थान, एवं भारत ज्ञान विज्ञान समिति की ने जन वसुंधरा साहित्य साहित्य फाउंडेशन के सहयोग से रज़ा का यह व्याख्यान रखा था।
रज़ा साहब ने देश में तर्कसंगतता पर हो रहे चौतरफा हमलों को रेखांकित किया। उन्हें तकलीफ थी कि कुतर्की बाबाओं की नये निज़ाम में खूब छन रही है – यहां तक कि शिक्षा के पाठ्यक्रम उनकी मर्जी से बदले जा रहे हैं। बाबा, राजनीति और लफंगे पूंजीवाद के बीच गठजोड़ बन गया है।
उनका कहना था कि देश के 10 बड़े बाबाओं के पास 2,000 करोड़ रुपये की संपत्ति है जिसे यदि सरकार अपने कब्जे में ले ले तो उससे देश के प्रत्येक स्कूली छात्र को पांच हजार रुपये की छात्रवृत्ति दी जा सकती है।
रज़ा का कहना था कि विज्ञान का काम ज्ञान पैदा करना होता है, और टेक्नोलॉजी का लक्ष्य हमारी क्षमता बढ़ाना होता है। विज्ञान किसी को फायदा और नुकसान के आधार पर नहीं चलता। मगर वह सोच का तरीका बदल सकता है और उसे तार्किक बना सकता है। लेकिन टेक्नोलॉजी के लक्ष्य राजनीतिक और आर्थिक होते है। रूढ़िवादियों का विज्ञान से हमेशा टकराव होता है मगर उनको टेक्नोलॉजी से कोई समस्या नहीं होती। वास्तव में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सबसे पहले रूढ़िवादी और कट्टरवादी करते हैं। टेक्नोलॉजी मानस और मानसिकता पर हमला करती है।
सभा की अध्यक्षता करते हुए विद्वान पत्रकार ओम थानवी का कहना था कि शीर्ष राजनेताओं का अवैज्ञानिक आचरण कोई नई बात नहीं है, वह इंदिरा गांधी के युग से प्रचलन में है। यहां तक कि बड़े मार्क्सवादियों ने भी अवैज्ञानिक बातें की। लेकिन अब अवैज्ञानिक सोच को शासन का सहारा मिल रहा है।
स्वागत वक्तव्य कोमल श्रीवास्तव ने तथा धन्यवाद प्रो. राजीव गुप्ता ने दिया।









