डॉ यतीश जैन, जबलपुर
केंद्रीय बजट 2026–27 में पुरातत्व के क्षेत्र को जिस गंभीरता, संतुलन और सकारात्मक दृष्टि से स्थान दिया गया है, वह यह स्पष्ट करता है कि भारत अब अपनी प्राचीन धरोहर को केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संपदा और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देख रहा है। इस बजट में उत्खनन और संरक्षण—दोनों को समान रूप से महत्व देते हुए यह स्वीकार किया गया है कि खोजे गए ऐतिहासिक तथ्य तभी सार्थक होते हैं, जब उन्हें सुरक्षित रखकर समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए।
इस समूचे ढाँचे का केंद्र आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया है, जो देश के पुरातात्विक उत्खनन, स्मारक संरक्षण और ऐतिहासिक अनुसंधान की शीर्ष संस्था है। बजट 2026–27 में संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत पुरातत्व से जुड़े कार्यों के लिए निरंतर और पर्याप्त वित्तीय प्रावधान रखे गए हैं। तथ्यात्मक रूप से देखा जाए तो संस्कृति मंत्रालय का कुल बजट लगभग ₹3,300 से ₹3,400 करोड़ के आसपास रखा गया है, जिसमें से ASI के लिए लगभग ₹1,250 से ₹1,300 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसी राशि के अंतर्गत उत्खनन, संरक्षण, मरम्मत, वैज्ञानिक अध्ययन, अभिलेख संरक्षण और तकनीकी संसाधनों पर व्यय किया जाना है। यह राशि अपने आप में इस बात का संकेत है कि सरकार पुरातत्व को एक नियमित और प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में देख रही है।
उत्खनन के संदर्भ में बजट का दृष्टिकोण अत्यंत सकारात्मक और दूरदर्शी है। देश के विभिन्न भागों में स्थित ऐतिहासिक स्थलों—जैसे हरियाणा का राखीगढ़ी, गुजरात का धोलावीरा, उत्तर प्रदेश का हस्तिनापुर और संकिसा, बिहार का वैशाली तथा मध्य प्रदेश के एरण और उज्जयिनी—पर चल रहे उत्खनन और अनुसंधान कार्यों को निरंतर वित्तीय समर्थन दिया जा रहा है। इन स्थलों पर उत्खनन केवल नई खोज के लिए नहीं, बल्कि पहले से प्राप्त अवशेषों के वैज्ञानिक पुनर्मूल्यांकन के लिए भी किया जा रहा है। बजट में इस निरंतरता को बनाए रखने का अर्थ यह है कि सरकार इतिहास को प्रमाणों के आधार पर समझने और प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
राखीगढ़ी और धोलावीरा जैसे स्थलों पर किए जा रहे उत्खनन और संरक्षण कार्यों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अलग-अलग चरणों में विशेष वित्तीय सहायता दी गई है। उदाहरण के रूप में, राखीगढ़ी क्षेत्र के समग्र विकास और संरक्षण के लिए सैकड़ों करोड़ रुपये के स्तर पर विशेष प्रावधान पहले ही किए जा चुके हैं, और बजट 2026–27 में ऐसे बड़े पुरातात्विक स्थलों पर चल रहे कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए संसाधनों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि सरकार उत्खनन को अल्पकालिक परियोजना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय दायित्व मानती है।
उत्खनन के साथ-साथ बजट 2026–27 में पुरातत्व संरक्षण को भी समान महत्व दिया गया है। ASI के अंतर्गत संरक्षित लगभग चार हजार स्मारकों की मरम्मत, स्थायित्व और वैज्ञानिक संरक्षण के लिए बजटीय प्रावधान उसी कुल राशि में शामिल हैं। यह संरक्षण कार्य केवल दीवारों और संरचनाओं की मरम्मत तक सीमित नहीं है, बल्कि शिलालेखों, मूर्तियों, प्राचीन चित्रों, धातु और मिट्टी से बने अवशेषों के संरक्षण को भी सम्मिलित करता है। बजट में इस बात पर बल दिया गया है कि संरक्षण कार्य आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से किए जाएँ, ताकि स्मारकों की मौलिकता बनी रहे।
बजट का एक और सकारात्मक पहलू यह है कि संरक्षण को जन-जुड़ाव और पर्यटन से जोड़ा गया है। ASI के अधीन कई प्रमुख पुरातात्विक स्थलों पर व्याख्या केंद्रों, संग्रहालयों, सुरक्षित भ्रमण मार्गों और मूलभूत सुविधाओं के विकास की योजना को आगे बढ़ाया गया है। इसके लिए भी वही बजटीय प्रावधान उपयोग में लाए जाएँगे, जिससे न केवल स्मारक सुरक्षित रहेंगे, बल्कि आम नागरिक और विद्यार्थी भी अपनी धरोहर को समझ सकेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।
सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो बजट 2026–27 में उत्खनन और संरक्षण के लिए किया गया वित्तीय प्रावधान यह दर्शाता है कि भारत अब अपने अतीत को उपेक्षित नहीं, बल्कि संरक्षित और सम्मानित करना चाहता है। लगभग ₹1,300 करोड़ के आसपास का ASI बजट यह सुनिश्चित करता है कि खोज, संरक्षण और प्रस्तुतीकरण—तीनों कार्य समानांतर रूप से चलते रहें। यह संतुलन ही इस बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
केंद्रीय बजट 2026–27 में पुरातत्व के क्षेत्र में उत्खनन और संरक्षण के लिए किया गया वित्तीय प्रावधान एक सकारात्मक और दूरदर्शी सोच को प्रतिबिंबित करता है। यह बजट यह स्पष्ट करता है कि भारत अपनी सभ्यतागत जड़ों को जानने, सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए न केवल वैचारिक रूप से, बल्कि आर्थिक रूप से भी प्रतिबद्ध है। यही प्रतिबद्धता भारतीय पुरातत्व को सशक्त बनाएगी और देश की सांस्कृतिक चेतना को और अधिक दृढ़ करेगी।









