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धर्म के नाम पर आस्था और पर्यावरण का बचाव – एक सुझाव

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(जीवनवेत्ता के रूप में लेख किसी भी आस्था को ठेस पहुंचाना लक्ष्य नहीं)
हमारे पूर्वज, शास्त्र ज्ञानी और ऋषि मुनि द्वारा पर्यावरण की दृष्टि से मानव जीवन और सभ्यता के लिए आवश्यक नदी (जल ही जीवन), पहाड़ (सुरक्षित वास) और वृक्षो (शुद्ध वायु और फल फूल) को पूज्यनीय इसीलिए बनाया गया क्योंकि यह तीनो प्राकृतिक तौर पर हमारे जीवन और जिंदा रहने की आवश्यक एवं आधार स्तंभ है।
नदीयो में करोड़ों लोगों का नहाना (उनका पसीना मलमूत्र बीमारी के कीटाणु), कूड़ा करकट, मूर्तियां, फुल पत्ती, दिये, मृतक की राख और हड्डियां छोड़ कर गंदा कर रहे हैं। भूल जाते हैं नदियों को मां का दर्जा है। यदी नदियो में स्नान नहीं करे और नदियो से जल लेकर घाट के दूसरी तरफ नहाए या अपने घर में जल ले जाये और वही नहा ले। नदी भी गंदी नहीं होगी और आपका गंगा नर्मदा जैसी पवित्र नदी के जल से स्नान का कोरम भी पूरा हो जाएगा।
बहता पानी स्व-शुद्ध होता है लेकिन औद्योगिक कचरे, शवों और अनट्रीटेड सीवेज (गंदे पानी) के कारण शुद्धता खत्म हो रही है। पूरे विश्व में सिर्फ हमारे यहां आस्था और व्यवहार में असंतुलन है इसीलिए हमारी नदियां सबसे ज्यादा मैली हो रही।
*अशोक मेहता, इंदौर ( लेखक पत्रकार पर्यावरणविद्)*

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Author: Editor

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