धर्म कोई दिखावे की वस्तु नहीं है और न ही यह किसी मंच की शोभा बढ़ाने का साधन है। धर्म वह आधार है जिस पर समाज की सोच, आचरण और भविष्य टिका होता है। जब यही धर्म गलत हाथों में चला जाता है तो उसका स्वरूप बदलने लगता है। तब साधना पीछे छूट जाती है और प्रचार आगे आ जाता है, तब संयम कमज़ोर पड़ता है और महत्वाकांक्षा मज़बूत हो जाती है। आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हमने धर्म की बागडोर सच में योग्य हाथों में सौंपी है या केवल बोलने और भीड़ जुटाने वालों को सौंप दी है। योग्य होने का अर्थ ऊँचे स्वर में भाषण देना नहीं होता, न ही बड़े मंच, बड़ी गाड़ी या भारी प्रचार से कोई योग्य बन जाता है। योग्यता का संबंध चरित्र से होता है, आचरण से होता है और उस त्याग से होता है जो बिना बताए किया जाए। जो स्वयं को सबसे पीछे रख सके वही धर्म को आगे रख सकता है। जो सम्मान की अपेक्षा न करे वही सम्मान के योग्य होता है। आज कई जगह देखा जा सकता है कि धर्म के नाम पर पदों की दौड़ लगी हुई है, उपाधियों की भूख है और प्रशंसा के बिना काम करने की क्षमता खत्म होती जा रही है। ऐसे में धर्म साधना नहीं रह जाता, एक आयोजन बन जाता है। समाज भी दोषमुक्त नहीं है, क्योंकि हम भीड़ देखकर प्रभावित हो जाते हैं और चरित्र देखने का धैर्य नहीं रखते। हमें यह समझना होगा कि धर्म का भविष्य भाषणों से नहीं, बल्कि जीवन से तय होता है। जिस व्यक्ति के जीवन में संयम नहीं, उसके शब्दों में धर्म नहीं हो सकता। जिस व्यक्ति के व्यवहार में विनम्रता नहीं, वह चाहे जितना बड़ा कहलाए, धर्म का नेतृत्व नहीं कर सकता। जब तक समाज यह तय नहीं करेगा कि वह किसे सुनेगा और किसे नहीं, तब तक धर्म की बागडोर बार-बार गलत हाथों में जाती रहेगी। धर्म को बचाने के लिए बड़े आंदोलन नहीं, सही चयन की आवश्यकता है। जैसे ही हम योग्य को पहचानना सीख लेंगे, धर्म अपने आप सुरक्षित हो जाएगा। बागडोर उन्हीं हाथों में रहनी चाहिए जो उसे थामने के साथ उसका भार भी उठा सकें, क्योंकि धर्म को पकड़ना आसान है, उसे निभाना कठिन है।
*— नितिन जैन*
संयोजक — जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)
जिलाध्यक्ष — अखिल भारतीय अग्रवाल संगठन, पलवल
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